नई दिल्ली: इन दिनों लद्दाख सीमा पर भारत और चीन के बीच तनातनी है. दोनों देशों ने सीमा पर अपने-अपने सैनिकों की तादाद बढ़ा दी है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जहां अपनी फौज को लड़ाई के लिए तैयार रहने को कहा है.
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीफ ऑफ डिफैंस स्टाफ के साथ बैठक कर ताजा हालात की समीक्षा की है.
क्या भारत-चीन के बीच युद्ध की कोई सम्भावना है? सीमा पर कब तक तनावपूर्ण हालात रहेंगे? यह मामला कब तक सुलझ पाएगा? इन मुद्दों पर भारत के पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल वी.पी. मलिक से बात की.
सवाल: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है. इसे हम किस अर्थ में लेंगे?
जवाब: इस वक्त चीन के जो संबंध हैं, बाहर की तरफ देखें तो ताइवान है, हांगकांग है, दक्षिणी चीन सागर है और फिर हमारा बॉर्डर है भारत-तिब्बत सीमा. इन सभी जगहों पर चीन ने खुद ही ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि एक बड़ी कॉन्फ्रैंस में राष्ट्रपति को अपनी फौज को तैयार रहने के लिए कहना पड़ा है. इसे सिर्फ भारत की तरफ से ही नहीं देखा जाए, इसको उस तरफ से भी देखा जाना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीफ ऑफ डिफैन्स स्टाफ बिपिन रावत के साथ बैठक की है.
सवाल: क्या आपको लगता है कि भारत-चीन के बीच युद्ध हो सकता है?
जवाब: मैं नहीं समझता कि इस वक्त ऐसे हालात हैं कि भारत-चीन युद्ध करेंगे. युद्ध का अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव न केवल दोनों देशों पर बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा. जिस हालात में इस वक्त हम हैं, छिटपुट घटनाएं या झड़प हो सकती हैं.
सवाल: लद्दाख में दोनों देशों की सीमा पर सैनिकों का भारी जमावड़ा है. इसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब: जो हालात पैदा हुए हैं, इसकी कई वजह हैं. कुछ तो भारत से संबंधित हैं और कुछ शायद चीन के भीतरी हालात की वजह से हैं. मैं समझता हूं, चीन नहीं चाहता कि हम अपने बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करें. हम जो रोड बना रहे हैं, जो श्योक के ऊपर से जाता है, उसको बंद कराने की कोशिश है. अभी उसने वहां अपनी सेना तैनात की है. पैंगोंग त्सो के नॉर्दन एरिया में भी कुछ छिटपुट घटनाएं हुई हैं. इससे हमारे स्थानीय लोगों को फायदा होगा और हमें अपने सैनिकों को तैनात करने में भी आसानी होगी, लेकिन चीन ऐसा नहीं चाहता है.
याद करा दूं कि कुछ समय पहले डेमचौक में जब हम एक गांव की तरफ सड़क बना रहे थे, तब भी चीन ने ऐतराज किया था. उसकी कोशिश रहती है कि चाहे कितने ही समझौते क्यों न हुए हों, बीच-बीच में वह विवादित क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी पैट्रोलिंग बढ़ाए और फिर उस पर कब्जा जमा ले. जम्मू-कश्मीर को लेकर भी रवैया बदल गया है, इसलिए लद्दाख में ऐसा दखल ज्यादा देखते हैं. इंटरनैशनल पॉलिटिक्स में चीन खुद को ग्लोबल पावर मानता है और अपना मुकाबला केवल अमेरिका से समझाता है.
ऐसे में चीन जहां भो हो, दबाव डालने की कोशिश करता है. दुनिया कोरोना वायरस के मामले में चीन पर दबाव डाल रही है तो चीन भी जगह-जगह दबाव बना रहा है. भारत के ऊपर भी दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है. कुछ दिन पहले ही हमने स्वीकार किया था कि कोरोना वायरस की इन्वैस्टिगेशन होनी चाहिए कि चीन की कोई भूमिका थी या नहीं. चीन से जो एफ.डी.आई. आ रही थी, उस पर भी हमने कुछ पाबंदियां लगाई हैं तो यह सारे कारण ऐसे हैं, जिसकी वजह से चीन विरोध कर रहा है.
सवाल: इसमें कोई शक नहीं कि चीन कोरोना संकट की वजह से दुनिया में घिर गया है. शक के घेरे में आया चीन क्या ध्यान बंटाने के लिए ऐसी हरकत कर रहा है?
जवाब: कोरोना भी एक वजह है. और भी भारत से संबंधित कई वजह हैं. जो मैंने बताई हैं लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जब से दुनिया ने उस पर उंगली उठानी शुरू की है, चीन आक्रामक हो गया है.
सवाल: ऐसा भी माना जा रहा है कि कोरोना के कारण दुनिया की कई फैकटरियां चीन से निकलना चाहती हैं. भारत की कोशिश इन इकाइयों को अपने यहां लाने की है. क्या चीन की सीमा पर गड़बड़ी की कोशिशों की यह भी वजह हो सकती है?
जवाब: हम लोग भी चाहते हैं कि अपनी आत्मनिर्भरता और मेक इन इंडिया में और सुधार लाएं. उसे और उत्कृष्ट बनाएं. इस वक्त मौका भी है. सारी बातों को मिलाकर देखा जाए तो चीन की नीयत दबाव डालने की है.
सवाल: क्या इस बैठक को चीन के साथ हमारे ताजा हालात से जोड़कर देखा जाए?
जवाब: अभी जो बैठक हुई है, उसकी बड़ी वजह यही है. पहले चीन ने सिक्किम के नाकुला एरिया, फिर लद्दाख के पैंगोंग त्सो में हरकत की है. सीमा पर इतनी बड़ी तादाद में सैनिक पहले नहीं लाए गए थे. वहां तम्बू लगाना, हथियार लेकर आना, नीयत कुछ खराब सी लगती है. इसका मुकाबला तो करना है. बैठक में मेरे ख्याल से सभी ने विचार रखे होंगे कि किस तरह मुकाबला किया जाए.
सवाल: चीन ने भारत में काम कर रहे अपने व्यावसायियों, यात्रियों और दूसरे लोगों को भारत से अचानक वापस बुलाने का फैसला किया है. ऐसी स्थितियां तो तभी पैदा होती हैं, जब युद्ध की आशंका हो. आपको क्या लगता है? जवाब: नहीं, मैं इसे उस तरह से नहीं देखता हूं. इस वक्त कोरोना की वजह से सभी देश अपने नागरिकों को, जो आना चाहते हैं, वापस बुला रहे हैं. चीन की हालत भी उतनी अच्छी नहीं है. चीन के जो लोग भारत में हैं, हो सकता है कि उन्होंने ही खुद को वापस बुलाने की मांग की हो.
सवाल: चीन की नीति तो शुरू से ही विस्तारवादी रही है. 1962 में जो लड़ाई हुई थी, उसमें भारत के करीब 38 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा कर लिया था. अब भी हम देखते हैं कि चीन सीमा पर अतिक्रमण की लगातार कोशिश करता रहता है?
जवाब: इसमें कोई शक नहीं कि चीन और भारत की जो सीमाएं हैं, उनका अब तक कोई हल नहीं निकला है. जिसे हम अपनी सीमा मानते हैं, उसे चीन नहीं मानता. अभी तक एल.ए.सी. की जो लाइन है, उसे भी हम आपस में नहीं मान पाए हैं. मैंने तो यह देखा है कि कई बार शांति के लिए बाऊंड्री को लेकर जो समझौते किए हैं, जब मर्जी आती है, चीन उसको अनदेखा कर देता है. चीन पर भरोसा करना, खासकर बॉर्डर एरिया पर, सही नहीं होगा. चीन का जो इतिहास रहा है, 1962 से लेकर अब तक, उस पर ध्यान देना चाहिए.
सवाल: आपकी बात ठीक है. अगर इतिहास देखें तो चीन ने पहले हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया. हमने विश्वास किया और धोखा खाया. अब जब लद्दाख की सीमा पर तनाव बढ़ गया है तो चीन की तरफ से फिर कहा गया है कि ड्रैगन और हठी साथ-साथ चल सकते हैं. क्या भविष्य में हम चीन पर भरोसा कर सकते हैं?
जवाब: हमने चीन के साथ बॉर्डर को लेकर जो समझौते किए हैं, उसने उन्हें फॉलो नहीं किया है. अनदेखी की है. इन बातों को देखते हुए मैं कहता हूं कि हमें मामले को बॉर्डर की तरफ से देखना चाहिए. पिछले कई वर्षों में सीमा पर आमने-सामने की नौबत आई है, हमें उसकी कथनी को नहीं, करनी को देखना चाहिए.
सवाल: अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और चीन के बीच मध्यस्थता की जो पेशकश की है, उसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब: यह तो बिल्कुल निरर्थक बात है. इस पर बहस करने का कोई मतलब ही नहीं बनता है.
सवाल: आपके हिसाब से भारत-चीन के बीच जो विवाद है, क्या जल्दी सुलझ जाएगा या अभी और आगे बढ़ेगा ?
जवाब: चीन के राजदूत, जो दिल्ली में हैं, के बयान को देखते हुए मुझे लगता है कि चीन भी नहीं चाहता कि यह मामला और आगे बढ़े लेकिन जिस तरह से दोनों देशों की फौज वहां डटी हुई है और मुकाबले के लिए तैयार है तो बात कुछ देर और चलेगी. इतना आसान नहीं होता कि जब एक जगह आप अपनी फौज भेजते हो और फिर उसको वापस बुलाते हो. मैं समझता हूं कि जो हालात हैं, वे पिछले सालों से बढ़कर हैं. इसको ठीक होने में समय लगेगा लेकिन आखिर में कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर कोई हल जरूर निकल आएगा.
सवाल: डोकलाम की घटना हो या लद्दाख की. चीनी सैनिकों का रवैया आक्रामक रहा है. भारत के साथ ऐसा व्यवहार क्यों होता है?
जवाब: जैसे-जैसे कोई देश ताकतवर बनता जाता है तो अपनी ताकत को इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगता है. सब देश करते हैं. जिनपिंग ने जब से सत्ता संभाली है, वे कहते आए हैं कि चीन की सेना को सबसे शक्तिशाली बनाना है. उन्होंने एक शब्द का इस्तेमाल किया है, ‘चयन ड्रीम’ उनका ड्रीम है कि किसी जमाने में जितने भी इलाके चीन में हुआ करते थे, उन्हें चीन में मिलाने की कोशिश करेंगे. इस समय चीन को अपने अंदरूनी दबाव को हटाने के लिए ऐसी हरकतें करनी पड़ रही हैं.

