रांची 30जून: राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू ने कहा कि आज हूल दिवस है। इस मौके पर संताल हूल के महानायकों सिदो-कान्हु, चांद-भैरव समेत सभी अमर महानायकों को नमन करती हूं और उनके प्रति अपनी श्रद्घा-सुमन अर्पित करती हूं। हूल दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन सराहनीय पहल है। इससे युवा पीढ़ियों को अपने स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों के बारे में बेहतर तरीके से अवगत होने का अवसर प्राप्त होगा। महानायकों से उन्हें प्रेरणा मिलेगी। साथ ही इस क्षेत्र के लोग भी अपने प्रिय महानायकों के योगदान से गौरवान्वित महसूस करेंगे। राज्यपाल रविवार को सिदो-कान्हू विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोल रही थीं। उन्होंनें कहा कि भारतीय इतिहास में स्वाधीनता संग्राम की पहली लड़ाई वैसे तो सन् 1857 में मानी जाती है, लेकिन इसके पहले ही वर्तमान झारखंड के संथाल परगना में संथाल हूल और संथाल विद्रोह के द्वारा अंग्रेजों को भारी विद्रोह का सामना करना पड़ा था।
सिदो-कान्हू के नेतृत्व में हुआ था क्रांति का आगाज
राज्यपाल ने कहा कि सिदो तथा कान्हु के नेतृत्व में 30 जून 1855 को वर्तमान साहेबगंज के भोगनाडीह गांव इस क्रांति का आगाज हुआ। इस विद्रोह के मौके पर सिदो ने घोषणा की थी, करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो। यह सत्य है कि ये देश उन्हीं का स्मरण करता है जिसने देश को कुछ दिया हो। हम सभी को अपने ऐसे महानायकों एवं देशक्तों से सीखना चाहिये कि उन्होंने किस विपरीत परिस्थिति में भी राश्ट्र के लिए साहसिक कार्य किया। राष्ट्रप्रेम की भावना प्रबल हो, ऐसा प्रयास हो।
विद्यार्थियों को निपुण एवं दक्ष बनायें
सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय का यह दायित्व है कि वे विद्यार्थियों को निपुण एवं दक्ष बनायें। चांसलर के रूप में मेरी इच्छा है कि सिदो कान्हु मूर्मू विश्वविद्यालय शिक्षा एवं अनुशासन के क्षेत्र में एक ऐसी पहचान स्थापित करें कि अन्य राज्यों से भी लोग यहां नामांकन के लिए आयें। शिक्षण संस्थान सिर्फ डिग्री न दें। सिर्फ डिग्री से कुछ नहीं होनेवाला है। आज का युग ज्ञान आधारित है और ज्ञान की कद्र होती है। उच्च शिक्षा के विकास के लिये यह आवश्यक है कि शिक्षण संस्थानों में आधारभूत संरचना उपलब्ध हों। साथ ही कक्षाएं नियमित हों, पुस्तकालय में पुस्तकें उपलब्ध हो और प्रयोगशाला विकसित हो।
घंटी आधारित की गई है शिक्षकों की नियुक्ति
शिक्षकों की कमी को तत्काल दूर करने के लिये घंटी आधारित अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। इसके अतिरिक्त सत्र के नियमितीकरण की दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं, सभी विश्वविद्यालयों को निर्देशित किया गया है कि विश्वविद्यालय परिसर में सर्वत्र ज्ञान का वातावरण निर्मित हों। शिक्षक विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन करें। वे गुरू कौटिल्य एवं द्रोणाचार्य आदि की तरह शिष्यों को निपुण बनायें। गुरू-शिष्य का संबंध प्रगाढ़ हो, ताकि नैतिक मूल्यों का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके। छात्रों से कहा कि अनुशासन के बिना सफलता प्राप्ति संभव नहीं है। उन्हें मूल्यों पर जोर देना होगा। अपने जीवन में नैतिकता और संस्कार पर बल देना होगा। चारित्रिक बनना होगा। अपनी कला-संस्कृति के प्रति भी प्रेम रखने की जरूरत है। खेलकूद भी आवश्यक है।

