रांची: झारखंड अफीम जैसे नशीले पदार्थ की अवैध खेती की वजह से पूरे देश में बदनाम हो रहा है और नशे के सौदागरों के लिए यह मिनी अफगानिस्तान बनता जा रहा है.
झारखंड के भौगोलिक क्षेत्रफल का करीब 30 फीसदी हिस्सा जंगलों से घिरा है और इसी वन अच्छादित क्षेत्र में नक्सलियों के इशारे पर अफीम की खेती का धंधा फल-फूल रहा है. साल दर साल यहां अवैध तरीके से अफीम की खेती बढ़ती जा रही है जिसकी सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी तस्करी हो रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार झारखंड के विभिन्न हिस्सों में 2017 में 2700 एकड़ अफीम की खेती नष्ट की गयी, वहीं 2018 में 2900 एकड़ अफीम की खेती नष्ट की गयी और 2019 मे यह आकंड़ा बढ़कर 3000 एकड़ तक आ पहुंचा.
पुलिस का मानना है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में सबसे ज्यादा अफीम की खेती होती है, नक्सली भोले भाले ग्रामीणों को बरगलाकर अफीम की खेती के लिए प्रोत्साहित करते हैं. इंटेलिजेंस विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक झारखंड में फिलहाल 10 हजार एकड़ से ज्यादा की जमीन पर अवैध तरीके से अफीम की खेती हो रही है और ये आंकड़ें हर साल बढ़ते जा रहे हैं.
अवैध तरीके से होती है पोस्ता की खेती
चतरा, खूंटी, हजारीबाग, लातेहार, बोकारो, साहेबगंज, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला खरसावां, पलामू, गढ़वा झारखंड के वो जिले हैं जहां बड़े पैमाने पर अवैध रूप से अफीम की खेती होती है. जबकि इंटेलिजेंस विभाग के सूत्रों के मुताबिक रांची जिले के ग्रामीण इलाके, सिमडेगा, गुमला, पाकुड़, जामताड़ा, गोड्डा और गिरिडीह में आंशिक तौर पर अफीम की खेती दर्ज की गई है. बताय गया है कि राज्य के 4 जिलों में से 18 जिलों में अफीम की खेती होती है. अफीम की खेती धड़ल्ले से होने के संबंध में जानकारों का मानना है कि य झारखंड का बड़ा हिस्सा जंगल है, अधिकतर इलाके पहाड़ी हैं, रास्ते दुर्गम हैं, झारखंड की मिट्टी और मौसम अफीम की खेती के अनुकूल है, यही वजह है कि नशे के सौदागरों की झारखंड पहली पसंद है.
अफीम की खेती के लिए सर्दियों का मौसम मुफीद होता है, ड्रग माफिया और उग्रवादी संगठन के लोग सितम्बर महीने में ग्रामीणों को पोस्ता के बीज उपलब्ध कराते हैं, अक्टूबर में बुआई होती है और नवंबर से पोस्ता के फल-फूल लगना शुरू हो जाते हैं और जनवरी से लेकर मार्च के बीच पोस्ता के फल से अफीम निकालने का काम होता है.

