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झारखंड लैंड म्युटेशन बिल: सरकार ऊहापोह में फंसी, कांग्रेस कोटे के मंत्री का कैबिनेट में विरोध नहीं, बाहर कर रहे विरोध

by bnnbharat.com
September 18, 2020
in समाचार
झारखंड लैंड म्युटेशन बिल: सरकार ऊहापोह में फंसी, कांग्रेस कोटे के मंत्री का कैबिनेट में विरोध नहीं, बाहर कर रहे विरोध
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चंदन मिश्र (वरिष्ठ पत्रकार),

रांची: झारखंड लैंड म्यूटेशन बिल 2020 का विपक्ष के साथ सरकार के साथी दलों के विरोध ने सरकार को सांसत में डाल रहा है. सरकार विधेयक को लेकर ऊहापोह की स्थिति में है. हेमंत सोरेन सरकार में सबसे बड़ा सहयोगी दल कांग्रेस के विधायक दल की बैठक में इस प्रस्तावित विधेयक का विरोध किया गया है.

इस बैठक में सरकार के दो वरिष्ठ मंत्री भी शामिल रहे. वित्त मंत्री सह पार्टी अध्यछ रामेश्वर उरांव और ग्रामीण विकास मंत्री सह विधायक दल नेता आलमगीर आलम. दोनों मंत्रियों ने भी कहा है कि कैबिनेट से इस विधेयक का प्रारूप पारित हो चुका है, लेकिन इस विधेयक में कुछ खामियां हैं. इसे लेकर कांग्रेस पार्टी मुख्यमंत्री से बात करेगी. इन खामियों को दूर किये बगैर विधेयक पारित करना उचित नहीं होगा.

इस विधेयक को लेकर कांग्रेस विधायक बंधु तिर्की शुरू से विरोध करते आ रहे हैं. इसे लेकर उनके संगठन ने राज्य के विभिन्न प्रखंड और अंचल कार्यालयों में विरोध प्रदर्शन भी किया है.

विपक्ष विधेयक के खिलाफ :

इधर, प्रमुख विपक्ष भाजपा इस विधेयक के खिलाफ है. भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने इसे काला कानून करार दिया है. भाजपा ने एलान किया है कि सरकार इस विधेयक को वापस नहीं लेगी तो सदन से लेकर सड़क तक राज्यव्यापी आंदोलन करेगी. बाबूलाल मरांडी का यह भी कहना है कि इस कानून के बनते ही अधिकारियों को जमीन का घोटाला करने और लूटने की छूट मिल जाएगी.

भाजपा के ही विधायक और पिछली सरकार में राजस्व भूमि सुधार मंत्री अमर कुमार बाउरी ने इस विधेयक को जनता के खिलाफ बताया है.

निर्दलीय विधायक की राय :

निर्दलीय विधायक सरयू राय का कहना है कि सरकार को इसे सदन में रखना चाहिये. इसमें यदि कोई त्रुटि है तो उस पर सदस्य संशोधन ला सकते हैं. सरकार भी इसमें संशोधन कर इसे पास करा सकती है. संसदीय परंपरा का तो अनुपालन होना ही चाहिए.

कैबिनेट में विरोध नहीं, बाहर विरोध :

कांग्रेस विधायक दल की बैठक में इस प्रस्तावित विधेयक का विरोध किया गया है. लेकिन इसके नेता कैबिनेट में इस विधेयक के प्रारूप को मंजूरी प्रदान कर देते हैं. दोनों मंत्री कैबिनेट में मौजूद थे, लेकिन दोनों ने इस पर कुछ नहीं कहा. लेकिन दोनों नेता विधायक दल की बैठक में इसके कुछ प्रावधानों का विरोध स्वीकार कर रहे हैं. यहां नेताओं को और स्पष्ट होना चाहिए.

सरकार में मंथन :

विधेयक को लेकर विपच्छ के विरोध के साथ साथ साथी दलों के विरोध के बाद सरकार के अंदर इस पर मंथन शुरू हो गया है. विपच्छ का विरोध तो सरकार कुछ देर के लिये दरकिनार कर विधानसभा विधेयक पेश और पास करा लेगी. लेकिन जब सरकार के प्रमुख साथी दल ने ही इसका विरोध शुरू कर दिया है तो मुख्यमंत्री इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं. इसे सरकार को गंभीरता से लेना उसकी जरूरत भी है और मजबूरी भी.

निर्दलीय विधायक सरयू राय ने विधानसभा के बाहर मीडिया से बात करते हुए कहा है कि विरोध को देखते हुए सरकार लगता है, डर गई है. सवाल है कि झामुमो अकेले सरकार में नहीं है और साथी दलों की भावना का अनादर करते हुए कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहेगी कि वे नाराज हो जाएं.

लैंड म्युटेशन विधेयक 2020 के विरोध के संभावित कारण :

इस बिल में तीन महत्वपूर्ण प्रावधान लाया गया है जो इस प्रकार हैं.–

1. विधेयक के चैप्टर-7 के सेक्शन- 9 में जमाबंदी खारिज करने के संबंध में – “यह शक्ति अपर समाहर्ता (ए सी) को दी गई है जो स्वत: किसी की शिकायत पर किसी जमाबंदी के संबंध में जांच कर सकता है और उस जमाबंदी को खारिज कर सकता है.”

विरोध करने वालों की आशंका :

कोई जमाबंदी शब्द का प्रयोग किया गया है जो एसी को असीम शक्ति देता है इसके दुरुपयोग के प्रबल संभावना हैं, क्योंकि राजस्व पदाधिकारी के संबंध में पूर्व से ही आम राय यह है कि यह भ्रष्ट तरीके अपनाते हैं.

2. सेक्शन-(22) यह सेक्शन राजस्व पदाधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करता है.

आशंका-  यदि यह प्रावधान लागू हो जाता है तो राजस्व पदाधिकारी बिल्कुल निर्भय और निडर हो जाएंगे और रैयतों के काम-कार्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. अपने उंचस्थ पदाधिकारी या जनप्रतिनिधियों का बात सुनने को तैयार नहीं होंगे.  क्योंकि इस प्रावधान में उनके किए गए कृत्य या उपकृत के संबंध में किसी भी दीवानी और फौजदारी न्यायालय में मामला नहीं लाया जा सकेगा.

3. आपत्ति-सेक्शन-(15) के अंतर्गत डीसी,कमिश्नर एडिशनल कलेक्टर, एल.आर.डीसी, सीओ को व्यवहार न्यायालय की शक्ति प्रदत की जा रही है जो अपने जांच के दौरान सिविल प्रोसीडयोर कोर्ट (सीपीसी) 1960 के तहत काम कर पाएंगे, और उनके द्वारा पारित आदेश एवं न्यायिक प्रक्रिया का आदेश बन जाएगा. जबकि अब तक उनके आदेश अर्धन्यायिक आदेश के रूप में मान्यता दी जाती है.

आशंका — हमारे राजस्व पदाधिकारी न  न्यायिक प्रक्रिया में प्रशिक्षित हैं और ना ही उन्हें न्यायिक स्तर के काम करने की क्षमता उपलब्ध है. ऐसी स्थिति में ऐसे पदाधिकारी द्वारा पारित आदेश काफी नुकसानदेह होगा और रैयतों के हितों को क्षति पहुंचाएगा.

चंदन मिश्र

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