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राजनीति में गुम हो गई कश्मीरी पंडितों की मूल समस्या

by bnnbharat.com
January 20, 2020
in समाचार
राजनीति में गुम हो गई कश्मीरी पंडितों की मूल समस्या
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राहुल मेहता,

रांची: हर रात की सुबह होती है, यह हम सभी जानते हैं. परंतु कश्मीरी पंडितों को आज भी 19 जनवरी 1990 की काली रात याद है जब उन्हें सांप्रदायिक हिंसा के कारण अपना घर-बार, समाज, कारोबार, सपना सभी त्याग घाटी छोड़ना पड़ा था.

रातो-रात लाखों कश्मीरी पंडित जमींदार से शरणार्थी बन बन गए. उनकी संपत्ति लूट ली गई, अनेक लोगों की हत्या कर दी गई, महिलाओं से दुराचार हुए और साथ में मिला अंतहीन मानसिक प्रताड़ना का दंश. उन्हें आज भी उस सुबह का इंतजार है जब वे उठे तो घाटी का चमकता सूर्य का किरण देखें. परंतु यह रात और इंतजार कुछ ज्यादा ही लंबी हो चली है.

गंभीर प्रयास का अभाव-

मुद्दा अत्यंत गंभीर है परंतु इसके लिए प्रयास नगण्य हुए हैं. राजनैतिक खींचातानी एवं दोषारोपण में कश्मीरी पंडितों का मामला कहीं गुम सा गया है. कोई इसकी जवाबदेही लेने को तैयार नहीं.

दिसंबर 1989 कांग्रेस को हराकर बीजेपी के समर्थन से जनता दल सरकार केंद्र में बनी. सरकार बनने के 1 सप्ताह के अंदर ही गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सैयद के बेटी का अपहरण हुआ जिसके बदले आतंकवादियों को छोड़ा गया. इसके महीने भर बाद ही कश्मीर में 19 जनवरी की रात जनसंहार हुआ और वीभत्स काली रात से कश्मीरी पंडितों का सामना हुआ. इसी दिन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने हिंसा के कारण इस्तीफा दे दिया. जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा दी गई. केंद्र और राज्य दोनों जगह बीजेपी समर्थित जनता दल की सरकार थी.

1990 से 2003 तक चला विस्थापन का दौर-

विस्थापन का यह दौर लंबा चलता रहा. 1998 में वंदेहामा में 24 कश्मीरी पंडितों की निर्मम हत्या कर दी गई. इस वक्त केंद्र में कांग्रेस समर्थित गुजराल जी की सरकार थी. इस घटना के बाद कश्मीरी पंडितों का विस्थापन की प्रक्रिया तेज हुई.

2003 में नदिमर्ग में 23 कश्मीरी पंडितों का हत्या ने कश्मीरी पंडितों के साहस को नेस्तनाबूद कर दिया और उन्होंने संघर्ष का रास्ता त्याग कर पलायन करने में ही अपनी भलाई समझी.

2003 में वाजपेई की सरकार थी और मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद थे. ऐसा नहीं की जिम्मेदार घटना काल की केंद्र और राज्य के सरकार ही थी. 1937 के बाद से उपजी परिस्थितियां और इसे हल करने में सरकार की विफलता भी एक प्रमुख कारण थी.

1990 से अब तक अनेक सरकार आई लेकिन कश्मीरी पंडित अपने घर से दूर निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं. धारा 370 परिवर्तन के बाद कश्मीरी पंडितों मैं भी घर वापसी की उम्मीद जगी है. उम्मीद है कि उनके भी अच्छे दिन जल्द आएंगे.

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