05 अप्रैल शहादत दिवस-एक श्रद्धांजलि
रांची: झारखंड की रत्नगर्भा धरती सदियों से वीर प्रसविनी रही है. जिन महापुरूषों ने जल, जंगल, जमीन के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया और अपनी सभ्यता, संस्कृति एवं अस्मिता की रक्षा के लिए प्राणों की आहूति दी. वैसे महान सपूतों में तत्कालीन जंगल महल, वर्तमान सरायकेला खरसावां जिला के नीमडीह प्रखण्ड के घुटियाडीह गांव में जन्मे एक लाल थे, जिसका नाम था रघुनाथ महतो.
वो बचपन से हीं उनके मानस पटल पर देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी. वे सदैव अन्याय, अत्याचार एवं शोषण के खिलाफ लड़ने वाले वीर सपूत थे. अंग्रेज जब किसानों से जबरन क र की वसूली करते थे, यहां तक कि आदिवासियों की जमीन छीनकर बंगाली जमीन्दारों के हाथों हस्तांतरण करते थे, दूसरे क्षेत्र से आये हुए लोगों को यहां बसाया करते थे, उस वक्त रघुनाथ महतो के मन में यह बात आई कि यदि अपनी जमीन पर जीना है, तो विद्रोह के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है और संकल्प लिया कि अपनी जमीन पर हमलोग किसी प्रकार का कर नहीं देंगे.
हमलोगों ने कठिन परिश्रम कर ऐ़ड़ी-चोटी का पशीना एक कर बंजर भूमि को कृषि योग्य खेत बनाया, गांव बसाया, तो हमलोग क्यों कर देंगे कहकर ‘‘अपना गांव अपना राज-दूर भगाओ अंग्रेज राज’’ का उद्घोष किया. धीरे-धीरे आग की ज्वाला की तरह अंग्रेजों के खिलाफ उक्त उद्घोष पूरे जंगल महल में फैला. ये एक कुशल रणनीतिकार भी थे. इनके भय से इष्ट इण्डिया कम्पनी के लोग भी कांपते थे.
रघुनाथ महतो बहुत तेजी से जंगल महल में अंग्रेजों के खिलाफ एक सशक्त नेता के रूप में उभरे, जिन्हें मुख्यतः कुड़मी, संथाल एवं भूमिज का पूर्ण सहयोग मिला. अंग्रेजों ने इस आन्दोलन के लोगों को ‘चुआड़’ शब्द से अभिहित किया.
चुआड़ आन्दोलन शुरू होने के पहले छोटानागपुर का क्षेत्र पटना काउन्सिल के अधीन था. पर चुआड़ क्रान्ति की आक्रमकता को देखते हुए 1773 में छोटानागपुर क्षेत्र को पटना काउन्सिल के नियंत्रण से हटाकर बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन कर दिया गया. ताकि स्वयं ईस्ट इण्डिया कम्पनी कलकत्ता से अपना शासन कर सके.
रघुनाथ महतो का आन्दोलन मेदिनापुर, धालभूम, नीमडीह, पातकोम, किचूमपरगना, बराभूम, पुरूलिया, झरिया, पंचेत आदि जगहों पर फैला हुआ था. उन्हें पकड़ने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी को काफी मशक्कत करनी पड़ी, लेकिन पुलिस के हाथों नहीं आए. उनके साथ डेढ़-दो सौ लोगों का लड़ाकू जत्था रहता था, जो हथियारों से लैश हुआ करते थे. ये लड़ाकू दस्ते के चलते पुलिस भी हिम्मत नहीं कर पाती थी.
शहादत स्थल पर गढे़ पत्थर (लोटा गांव का ऐतिहासिक स्थल)
1776 तक चुआड़ विद्रोह का केन्द्र स्थल सिल्ली और झालदा था. क्रान्तिकारियों की अगुवाई झगडु महतो एवं डोमन भूमिज करते थे. 05 अप्रैल 1778 ई0 रांची जिलान्तर्गत सिल्ली प्रखण्ड के पीतालोटा के जंगल से सटे स्थान पर बैठक कर रामगढ़ पुलिस छावनी में हमला करने हेतु रघुनाथ महतो एवं उनके समर्थक रणनीति बना रहे थे कि अंग्रेजों के सिपाहियों ने बन्दूकों से ताबड़तोड़ गोलियां बरसायी, जिससे रघुनाथ महतो सहित दर्जनों विद्रोही मौत के घाट उतर गये.
उस शहादत स्थल पर उन शहीदों के स्मृति में गाढ़े गये पत्थर आज भी विद्यमान है, जहॉं प्रतिवर्ष 05 अप्रैल को शहीदों के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, सभा होती है और श्रद्धासुमन अर्पित की जाती है. शहीद कभी मरते नहीं, सदैव जीवित रहते हैं. शहीदों के चिताओं पर लगेंगे हरवर्ष मेले. वतन पर मरनेवालों का बाकी यह निशां होगा.

