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क्या अदा, क्या जलवे थे सरकार के ‘ साहब बहादुरों ’ के, बस नाम ही काफी था…

by bnnbharat.com
October 6, 2020
in Uncategorized
झारखंड में भाजपा का नया शिगुफा: शैडो कैबिनेट
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 चंदन मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार

रांची: वो भी क्या दिन थे ? पसीना भी गुलाब हुआ करते थे. जिधर देखो इनका जलवा ही जलवा था. बस नाम ही काफी था. नाम लिया नहीं कि काम आसानी से हो जाता है. एक फोन ही तो करना होता था. ‘ ‘साहब बहादुर’ ( पर्सनल सेक्रेटरी) का फोन आते ही अफसर हों या बाबू, इंजीनियर हों या ओवरसियर सबकी घिग्घी बंध जाती थी.

कई ‘ साहब बहादुरों ’ की ख्याति राज्य के अंदर गांव-गांव तक फैली हुई थी. ‘सरकार बहादुर’ (मंत्री) तो बाद में याद किए जाते थे, पहले तो सलाम बंदगी ‘ साहब बहादुरों ’ को ही करनी पड़ती थी. अपना मत्था इनके दर पर जब टिकता था तो आगे बढ़ने का पासपोर्ट जारी होता था. इनका रुतबा देखने और सुनने लायक होता था. मजाल है कि कोई इनकी इजाजत के बगैर ‘ सरकार बहादुर’ से मिल ले? मंत्रालय में इनकी इच्छा के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था. ‘ साहब बहादुरों ’ की धमक और हनक मंत्रालय और सचिवालय से लेकर ब्लॉक के हाकिमों तक हुआ करती थी. इनकी कोई हुक्म उदुली नहीं कर सकता था.

राज्य बनने के तुरंत बाद ही इनका जलवा देखने को मिल गया था. हर मंत्री के पास एक से एक नायाब शख्सियत बतौर साहब बहादुर पदस्थ थे. आपकी जुबां पर मंत्री का नाम चढ़ न चढ़े, इन ‘साहब बहादुरों’ के नाम जरूर चढ़े रहते थे. मंत्रियों के साथ अब कहां वैसे साहब बहादुर रहे? वे अभी कहां हैं, किस अंदाज और हालात में हैं आम लोगों को नहीं पता ? उनकी एक अलग पौध ही थी. मानो धरा पर उनका अवतरण इसी काम से ही हुआ है.

झारखंड में साहब बहादुरों की एक लंबी फेहरिस्त रही है. याद कीजिए एक ‘ साहब बहादुर’ अतीश सिंह को. उनके सरकार बहादुर (मंत्री) आज जेल की सजा काट रहे हैं. क्या जलवे थे श्रीमान अतीश के. रांची से दिल्ली तक धमा-चौकड़ी मची रहती थी. नाम ही काफी था. अतीश सिंह का फोन आया नहीं कि काम हुआ. दूसरे शख्स मनोज सिंह थे. शुरुआती दिनों में वह पहले वित्त मंत्री के ‘साहब बहादुर’ रहे. फिर ज्यों-ज्यों उनका रुतबा बढ़ा, हर सरकार में वह बतौर ‘साहब बहादुर’ अपना जलवा बिखरते रहे.

इसी बीच व्यक्तिगत राजस्व वृद्धि में भी आगे रहे. नतीजा यह रहा कि आय से अधिक संपत्ति मामले में उन्हें जांच एजेंसी ने धर लिया. बहुत दिनों तक वह झारखंड से लेकर बिहार के गांव-गांव तक भागते फिरे. पता नहीं उनका अब कहां अब ठौर–ठिकाना है. इन साहब बहादुरों में एक नाम आपको जरूर याद होगा, संजय झा. क्या अंदाज थे श्रीमान के. उनके सरकार बहादुर भी कम दिलेर नहीं थे. उनकी काफी गहरी छनती थी. ऐसे ही साहब बहादुरों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. ‘ साहब बहादुरों ’ की इस लंबी श्रृंखला में कई नाम ऐसे हैं जो सबके यारों के यार बनकर रहे हैं. इनमें से हिमांशु का नाम एक ऐसे शख्सियत की है जो आज भी सबके ‘अपने ’ हैं. सत्ता में रहें या सत्ता से बाहर, इनका अंदाज कभी नहीं बदला.

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