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14 अगस्त 1942 को अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए थे ललऊ मिश्र

by bnnbharat.com
August 14, 2020
in समाचार
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जगदम्बा प्रसाद शुक्ल,

प्रयागराज:  भारत को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराने में देश के अनेक देशभक्तों ने अपने प्राण निछावर कर दिए वही 1942 में अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन करते हुए प्रयागराज में करमा के लाल ललऊ मिश्र ने अंग्रेजों की गोली से अपने प्राण गंवाकर क्षेत्र को गौरवान्वित किया. 14 अगस्त 1942 को देश के लिए शहीद होकर ललऊ ने जो इतिहास बनाया उसे याद करके आज भी क्षेत्र के युवक रोमांचित हो उठते हैं. पंडित राम प्रसाद मिश्र उर्फ ललऊ का जन्म 1904 में हुआ था. उनके पिता का नाम सरयू प्रसाद मिश्र तथा मां का नाम रुक्मिणी देवी था.

उस समय देश मे अंग्रेज हुकूमत के विरुद्ध जगह जगह आंदोलन चलाये जा रहे थे. करमा के कुछ युवकों ने देश के लिए कुछ करने के जज्बे से एक टीम बनाई जिसमें बंशी लाल जायसवाल कप्तान, श्रीकांत पाण्डेय, भगौती प्रसाद उर्फ लल्ला बाबू, सालिकराम केसरवानी, कन्हैया लाल पाण्डेय, विश्वनाथ पाण्डेय, संगम लाल जायसवाल, सहादेव, ननकू वर्मा आदि शामिल रहे. युवक हो चुके ललऊ भी साथियों की गतिविधियों को देखते हुए देशभक्तों की टीम में शामिल हो गए.

बेटे को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होते देख पिता चिंतित हो गए. यह सोचकर कि बेटा हाथ से निकल न जाय, 18 वर्ष की उम्र में शकुंतला देवी के साथ उनका विवाह कर दिया. विवाह के बाद ललऊ ने ईमानदारी से गृहस्थ जीवन का पालन किया. उनके काशी प्रसाद व प्रेमनाथ दो पुत्र तथा बिट्टन देवी पुत्री पैदा हुए लेकिन देश के प्रति उनका जज्बा उसी तरह कायम रहा.

14 अगस्त को साथियों के साथ डाकघर लूट कर जताया विरोध

देश मे उस समय चारों तरफ अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था. करमा में भी देशभक्त टीम ने एक योजना बनाया और करमा का डाकघर लूट लिया. यह खबर आग की तरह फैल गयी और थोड़ी ही देर में पास के छीतूपुर में रह रही अंग्रेज सिपाहियों की टुकड़ी जीप से करमा पहुंच गई. सिपाहियों से बचने के लिए सभी क्रांतिकारी इधर उधर छिप गए. थोड़ी देर बाद सिपाही बस्ती के कुछ लोगों को पकड़कर जीप के पास आई तो कीचड़ में फंस जाने के कारण स्टार्ट नही हुई. सिपाहियों ने लोगों से जीप में धक्का लगाने का आदेश दिया तभी काली चौरा के पास नीम के पेड़ के पीछे खड़े ललऊ ने ललकारा कि फिरंगियों की जीप में कोई धक्का नही लगाएगा. उनके मुंह से इतना निकलते ही अंग्रेज अफसर ने उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया और खुद जीप में धक्का लगाकर जीप स्टार्ट किया तथा ललऊ के शव को लेकर भाग गए.

शहीद स्थल पर बनाया गया स्मारक

शहीद ललऊ का शव अंग्रेज उठा ले गए लेकिन गोली लगने के बाद जहां वे गिरे थे उस स्थल पर परिजनों व ग्रामीणों द्वारा एक स्मारक बनाया गया. प्रति वर्ष 14 अगस्त के दिन उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उनके परिवार सहित गांव व आसपास के लोग उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं और देशहित में उनके द्वारा किए गए कार्यों को याद करते हैं.

नेताओं ने श्रद्धा सुमन अर्पित कर शुरू किया चुनाव प्रचार

इलाहाबाद संसदीय सीट से चुनाव लड़ने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा, जनेश्वर मिश्र, मुरली मनोहर जोशी, सरोज दुबे, अमिताभ बच्चन, के पी तिवारी, कुंवर रेवती रमण सिंह, डॉ रीता बहुगुणा जोशी जैसे अनेक नेता हैं जिन्होंने शहीद स्मारक पर फूल माला चढ़ाकर अपने चुनाव प्रचार की शुरुवात किया. लेकिन शहीद स्थल के निर्माण या सौंदर्यीकरण की ओर किसी का ध्यान नहीं गया.

नहीं मिला शहीद का दर्जा

शहीद ललऊ मिश्र को गोली मारने के बाद अंग्रेज सिपाही उनके शव को उठा ले गए जिससे तत्कालीन अभिलेखों में उनका नाम नहीं आ सका. उनकी टीम में काम करने वाले सभी लोगों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त हो गया लेकिन उन्हें शहीद होने का लिखित गौरव नहीं प्राप्त हो सका. कौंधियारा ब्लॉक के एक शिलालेख में उनका नाम अवश्य अंकित है. उनके प्रपौत्र सूरज कुमार मिश्र व भानू मिश्र सहित कुछ ग्रामीणों ने उन्हें शहीद का दर्जा दिलाने के लिए भागदौड़ किया लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला.
ललऊ मिश्र को भले ही सरकारी अभिलेखों में शहीद का स्थान न मिल पाया हो लेकिन यमुनापार सहित क्षेत्र के लोग आज भी शहीद को याद करके रोमांचित हो जाते है और गर्व महसूस करते हैं.

 

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