मास्को : रूस और अमेरिका के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों से लगातार गिरावट का दौर जारी है. इसका असर हर जगह दिखाई भी दे रहा है. इस तनाव को रूस और जर्मनी के बीच बन रही तेल और गैस पाइपलाइन नॉर्ड स्ट्री म पर भी देखा जा सकता है. आपको बता दें कि जर्मनी, रूस का सबसे बड़ा तेल और गैस का खरीददार है. हालांकि जर्मनी के अलावा पूरे यूरोप में रूसी गैस और तेल की सप्लारई होती है. वहीं जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यावस्थाे है और लगभग संपूर्ण यूरोप ही तेल और गैस के लिए रूस पर निर्भर है. अभी तक रूस की ये सप्लााई लाइन यूक्रेन से होकर गुजरती है.
दो वर्ष पहले हुए एक समझौते के मुताबिक यूक्रेन को इसके ऐवज में 2024 तक हर वर्ष 7 अरब डॉलर हासिल होंगे. रूस, यूरोप और खासकर जर्मनी को होने वाली सप्ला्ई का करीब 40 फीसद हिस्साक इसी पाइपलाइन से भेजता है. रूस की गैस और प्राकृतिक गैस पाइप लाइन करीब 53 हजार किमी लंबी हैं. लेकिन रूस के सामने सबसे बड़ी समस्याक ये है कि उसकी पाइपलाइन काफी पुरानी और जर्जर हो चुकी हैं, जिसकी वजह से उसको नुकसान उठाना पड़ता है. इन जर्जर लाइन में अक्स र गैस और तेल रिसाव की घटनाएं सामने आती हैं, जो उसके लिए बड़ी समस्याह बन जाती हैं. इस समस्या से निजात पाने के लिए रूस ने नॉर्ड स्ट्रीेम-2 की शुरुआत की है.
नार्ड स्ट्री म दरअसल, रूस और जर्मनी के बीच समुद्र के नीचे से सीधी जाने वाली पाइपलाइन है. इसके जरिए रूस ज्याएदा तेजी और अधिक मात्रा में अपनी गैस और तेल आपूर्ति कर सकेगा. ये पाइप लाइन बाल्टिक सागर से होकर गुजरेगी. इस पूरे प्रोजेक्टी की लागत करीब 10 अरब यूरो की है. इसके जरिए रूस हर वर्ष जर्मनी को 55 अरब क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति कर सकेगा. इसको लेकर जहां जर्मनी और रूस काफी उत्सालहित हैं वहीं यूक्रेन और अमेरिका इस पाइप लाइन का जबरदस्तू विरोध कर रहे हैं. यूक्रेन को डर है कि ये पाइपलाइन के बन जाने से उसको जो कमाई होती है वो बंद हो जाएगी जो उसके लिए आर्थिकतौर पर नुकसानदेह साबित होगी. वहीं अमेरिका की मंशा जर्मनी समेत यूरोप को अपनी गैस और तेल बेचने की है. ऐसे में नॉर्ड स्ट्री म-2 से उसकी मंशा पर पानी फिर सकता है.
बाल्टिक सागर से होकर जाने वाली इस नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन का 90 फीसद काम पूरा हो चुका है. इस बीच इसको लेकर विरोध के स्वंर भी तेज हो गए हैं. अमेरिका यूरोप पर इसका विरोध करने को लेकर दबाव भी बना रहा है. इतना ही नहीं जर्मनी के लिए भी अमेरिका इसको एक खराब सौदा बता रहा है. फ्रांस और पोलैंड समेत कुछ दूसरे यूरोपीय देश मानते हैं कि नॉर्ड स्ट्री म-2 से जहां गैस का पारंपरिक ट्रांजिट रूट कमजोर होगा वहीं इससे रूस पर यूरोप की निर्भरता बढ़ जाएगी. इन विरोधी स्वुर के बीच जर्मनी ने साफ कर दिया है कि वो अपना फैसला नहीं बदले वाली है. हालांकि वहां की प्रमुख विपक्षी ग्रीन पार्टी और एफडीपी पार्टी भी इसका विरोध कर रही हैं. गौरतलब है कि पूरी दुनिया में रूस की गिनती दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पा दक देशों में होती है. साथ ही रूस दुनिया में प्राकृतिक गैस और तेल से सबसे अधिक कमाई करने वाले देशों में से एक भी है.
नॉर्ड स्ट्री म-2 और नॉर्ड स्ट्रीूम-1 दोनों का रूट काफी कुछ एक ही है. नॉर्ड स्ट्री म-1 की शुरुआत वर्ष 2011 में हुई थी और 1222 किमी लंबी इस पाइप लाइन का उदघाटन अक्टूबर 2012 में किया गया था. ये उप-समुद्रीय क्षेत्र की अब तक की विश्व में सबसे लंबी पाइप लाइन भी है. वहीं नॉर्ड स्रीत म-2 को यूं तो वष्र 2018-19 में मंजूरी मिल गई थी लेकिन रूस पर लगे प्रतिबंधों की वजह से इसके काम में रुकावट आ गई थी. इसके अलावा कोविड-19 महामारी की वजह से भी ये 2020 तक पूरी नहीं हो सकी.

