झारखंड में संयुक्त वाम मोर्चा बना कर चुनाव लड़ने की रणनीति बन रही है और विशेष महत्वपूर्ण बैठक करने के बाद इसकी घोषणा 16 जुलाई को रांची में कर दी जाएगी .लोकसभा चुनाव के बाद -2019 में ही नवम्बर दिसम्बर में झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड में तमाम वामदलों ने महागठबंधन से किनारा कर लिया है.

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वामदलों ने झारखंड के लोकसभा चुनाव 2019 में कुछ सीटों पर चुनाव भी लड़ा था लेकिन महागठबंधन में इन्हें तरज़ीह ही नहीं दी गई और यह बात वामदलों को नागवार गुजरी थी. वामदलों की ये भी सोच है की लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग-अलग होते हैं और यह भी तय है कि सत्ता में वामदलों को आना नहीं है तो क्यों ना नीतियों और सिद्धांतों के अनुरूप अपने अपने जनाधार वाले क्षेत्रों में वाम दल अलग अलग प्रत्याशी दें और वाम गठबंधन बनाकर एक दूसरे को चुनावी सहायता प्रदान की जाए.
वाम दलों का यह भी कहना है की नीतियों और सिद्धांतों में विपक्ष में भी महागठबंधन से जुड़े दलों की सोच कारपोरेट घराने के पक्ष में दिखती है. कांग्रेस, झामुमो जैसे झारखंड के बड़े दल कहीं ना कहीं भाजपा सरकार की कारपोरेट नीतियों के अनुरूप समर्थन करते दिखते हैं जोकि आमजन के हितों के अनुकूल नहीं है.
झारखंड में कई विधानसभा सीट है जहां लाल झंडा धारी वाम दल की स्थिति बेहतर भी है और 2019 में कुछ विधानसभा सीटों पर वामदलों के उम्मीदवार विजयी भी हो सकते हैं. महत्वपूर्ण वामदलों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी हो (भाकपा)या मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा)फिर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी (माले) सभी लाल झंडा धारी छोटे बड़े वाम दलों का अपना अपना अलग अलग जनाधार भी है, विधानसभा चुनाव लड़ने से इन्हें सीटें भी प्राप्त हो सकती है यानी सत्ता तो प्राप्त करनी ही है बल्कि अपना वजूद भी बचाना है और सदन में भागीदारी भी दर्ज करनी है जोकि सत्तासीन सरकार के जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आवश्यक है.
फिलहाल 81 में से लगभग 40 सीट पर वाम एकता कायम करते हुए चुनाव लड़ने का मन बनाया गया है और नेता प्रतिपक्ष हेमन्त सोरेन द्वारा आहूत बैठकों में इसकी बानगी भी दिखाई देने लगी है. संयुक्त विपक्ष बैठक में वामदलों को भी आमंत्रित किया जाता है लेकिन मार्क्सवादी समन्वय समिति और फारवर्ड ब्लॉक को छोड़ अन्य महत्वपूर्ण दल भाकपा, माकपा और भाकपा (माले) ने बैठक से दूरी बनाए रखी है और अब कोई चमत्कार ही वाम दलों को गठबंधन में आने के लिए मजबूर कर सकता है।

