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महत्वाकांक्षा: एक गलती से सूखे पत्ते की तरह बिखर गई जिंदगी…

by bnnbharat.com
May 2, 2020
in समाचार
महत्वाकांक्षा: एक गलती से सूखे पत्ते की तरह बिखर गई जिंदगी…
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नीता शेखर,

रांची: समय की आंधी में हम सभी बह रहे हैं. पता नहीं यह आंधी कहां से आती है और कहां ले जाना चाहती है… इंसान जानता ही नहीं है कि वह क्या कर रहा है और क्या करना चाहता है.

ऐसा लगता है बस इस भीड़ भरी दुनिया में सभी चले जा रहे हैं और चलना ही उनकी नियति है. चलते-चलते जब किसी व्यक्ति से गलती हो जाए तो सब कुछ सूखे पत्ते की तरह बिखर जाता है… फिर उसे समेटना इतना मुश्किल हो जाता है कि पूरी जिंदगी निकल जाती है.

आज पूजा को बहुत जोर का धक्का लगा था. आज वह बिल्कुल अकेली पड़ गई थी. उसके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं था. सुख शांति और खुशी, सब कुछ तो था पर अपने सपने और ख्वाहिशों के चक्कर में खुद ही सब कुछ गवां बैठी थी.

आज उसे महसूस हो रहा था कि सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं था उसके पास, क्योंकि इसकी जिम्मेदार वह खुद ही थी. उसके पास सब कुछ था  पर कैरियर के चक्कर में सब कुछ छोड़ आई थी.

पूजा बचपन से ही बहुत महत्वाकांक्षी थी. पढ़ने लिखने में भी काफी तेज थी. उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, फिर किसी कंपनी में ज्वाइन कर लिया, फिर उसने एमटेक करने के लिए सोचा… लोगों ने काफी समझाया पर वह तैयार नहीं हो रही थी. उसे तो बस अपनी धुन थी. इसी बीच उसकी शादी हो गई.

मनोज बहुत ही अच्छा लड़का था, उसने पूजा से कहा जो करना है कर सकती हो, मैं तुम्हारे रास्ते में कभी बाधा नहीं बनूंगा. अब तो पूजा बहुत ही खुश हो गई. इसी बीच वो एक बच्चे की मां बन गई. उसकी ख्वाहिश अभी पूरी नहीं हुई थी और मनोज ने भी उसे परमिशन दे दी था. फिर उसे अमेरिका के कॉलेज में एमटेक करने का मौका मिल गया था, फिर उसने जाने की तैयारी शुरू कर दी.

पूजा अपनी महत्वाकांक्षाओं के पीछे इतनी पागल थी कि उसने यह भी नहीं सोचा कि 6 महीने के बच्चों को किसके पास छोड़ कर जा रही है. वह तो अपनी महत्वाकांक्षा को पा लेना चाहती थी और उन सभी को छोड़ कर चली गई.

पूजा अपने बेटे को छोड़कर चली गई. उसे थोड़ी सी भी चिंता नहीं हुई कि उसका बेटा कैसे रहेगा, कहां और किसके पास रहेगा. वह तो अपनी महत्वाकांक्षाओं के पीछे भाग रही थी. उसके जाने के बाद मनोज ने अपनी मां को बुला लिया.

देखते-देखते 5 साल बीत गए थे. पूजा शुरू में तो फोन किया करती थी, पर धीरे-धीरे वह भी बंद कर दिया. फिर वह फोन भी नहीं करती थी. तब सब ने मनोज से कहा कि तुम दूसरी शादी कर लो. मनोज ने दूसरी शादी कर ली.

मनोज की दूसरी पत्नी का नाम अंजलि था. वो बहुत ही सुलझी हुई और बहुत ही अच्छे विचार की थी. उसने पूजा के बच्चे को ऐसे अपना लिया जैसे उसका ही बेटा हो. बच्चे का क्या है, उन्हें तो जहां से प्यार मिलता है वो उधर के हो जाते हैं. देखते-देखते 20 साल बीत गये.

इसी बीच पूजा भी काफी ऊंची ओहदे पर पहुंच गई थी. अब वह अकेली थी. उसके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है. तब उसे इंडिया की याद आई. याद आई की वो सब कुछ छोड़ कर चली गई थी. फिर वह वापस इंडिया आई तो उसने देखा उसकी जगह किसी और औरत ने ले ली है और बेटा बड़ा हो गया था. वह अपने बेटे से मिलना चाहती थी पर बेटे ने इंकार कर दिया.

उसने कहा कि जिस मां को मैंने देखा ही नहीं और जो 6 महीने के बच्चे को छोड़कर चली गई वह मेरी मां नहीं हो सकती. मेरी मां तो अंजलि मां हैं. उसके अलावा मैं किसी को नहीं जानता. पूजा ठगी सी खड़ी रह गई. उसने मिलने से इंकार कर दिया. उसने कहा कि नहीं मैं नहीं मिलूंगा. उसके पापा ने भी कहा मैं क्या कर सकता हूं तुम तो इतनी महत्वाकांक्षी थी कि अपने छोटे से बच्चे को छोड़कर चली गई.

तुमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा तो फिर आज किस बात का तुम्हें गम है. तुम जो पाना चाहती थी जिंदगी में… सब कुछ तो पा लिया. तुम्हारे पास अब सब कुछ है. आज पूजा को महसूस हो रहा था कि उसके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है.

आज उसकी महत्वाकांक्षा उसे ले डूबी थी. उसकी गृहस्थी एक सूखे पत्ते की तरह बिखर गई थी, जिसे वह समेटना भी चाहे तो नहीं समेट सकती थी. बहुत कोशिशों के बाद भी जब पूजा का बेटा उससे नहीं मिला तो वह वापस आ गई और आने के बाद यही सोचती रही कि काश मैंने ऐसा ना किया होता, मगर अब कुछ नहीं हो सकता था.

महत्वाकांक्षी बनिए.. पर ऐसा नहीं कि आपकी गृहस्थी सूखे पत्ते की तरह बिखर जाए. महत्वाकांक्षाओं की रेस में जो लोग दौड़े चले जाते हैं उन्हें पता ही नहीं होता कि जिंदगी में क्या करना चाहते हैं और क्या नहीं… जब तक उन्हें पता चलता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

जैसे पूजा ने अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अपने 6 महीने के बच्चे को छोड़ दिया. आज उसे महसूस हो रहा था कि जिंदगी में सब कुछ पैसा ही नहीं होता है. आज उसके पास कुछ था… तो वो था केवल पैसा, गाड़ी, बंगला. जो उसे स्टैंडर्ड तो दिला सकते थे पर सुख शांति नहीं दिला सकते थे.

आज वह अपना गृहस्थी समेटना भी चाहे तो नहीं कर सकती थी, क्योंकि उसकी गृहस्थी सूखे पत्ते की तरह बिखर गई थी. जिसे समेटना अब मुमकिन नहीं था. बल्कि नामुमकिन था. आज उसका हाथ ऐसे ही खाली रह गया था.

 

नीता शेखर(समाजसेवी)

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