निरज कुमार,
रांची: झारखंड की राजधानी रांची में लगभग हर प्रमुख चौक चौराहों पर आपको कूड़ा उठाते कुछ लोग दिख जाएंगे. इनमें से कुछ हालात के मारे होते हैं. कुछ इसी को पेशा मान बनाकर जिंदगी भर यही काम करते हैं. हालांकि उन पर किसी का ध्याोन नहीं जाता है. कुछ इसी तरह का जीवन जी रही है रांची के कडरू इलाके की रहने वाली दो बहनें सोनी और रानी परवीन, जो सालों से यही काम कर अपना गुजर-बसर कर रही हैं.
ये दोनों बहनें कचरा बेचकर अपना घर चलाती है. रानी परवीन का कहना है कि उन्हें कचरा उठाने और उससे बेचकर इनकम करने में किसी तरह की खराबी नहीं लगती है. यह भी एक काम है. कैसी शर्म इसी से हमारा घर चलता है.
रानी परवीन 10 साल की उम्र से ही इस काम को कर रही है. अभी रानी की उम्र 26 साल है. वह टूटी-फूटी अंग्रेजी भी बोल लेती है. उसके तीन बच्चे हैं. तीनों बच्चे पढ़ाई नहीं करते. पति भी साथ नहीं रहता. साल में एक बार घर आता है. दिल्ली में रहकर ही अपना गुजारा करता है. सप्ताह में एक या दो बार फोन कर हालचाल पूछ लेता है.
छोटी बहन सोनी परवीन (बदला हुआ नाम) भी उसके साथ में ही रहती है. मां बाप नहीं होने का कारण रानी, सोनी को अपने घर पर ही रखती है. 15 वर्ष की सोनी भी इसी काम में बहन का हाथ बटाती है. घर में कोई परिजन नहीं होने के कारण सोनी भी बहन के साथ सड़क पर घूम-घूमकर कूड़ा उठती है.
सोनी पढ़ना चाहती है, पर हालात के कारण सोनी पढ़ाई नहीं कर पा रही. दोनों बहन मिलकर महीने भर का 9 से 10 हजार कमा लेती हैं. जिसमें से आधा से अधिक पैसा रेंट और खाने में चला जाता है. बचे पैसे इधर-उधर के कामों में चला जाता है. इनके पास कोई सरकारी सुविधा नहीं है. न राशन कार्ड न ही आयुष्मान कार्ड बना हुआ है, जिससे कि वे सरकारी सुविधाओं का लाभ ले सकें.
वैसे तो शिक्षा सबका मौलिक अधिकार है. सरकार की ओर से भी ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ योजना चलाई जा रही है, लेकिन अभी भी बहुत से जरूरतमंदों तक यह योजना नहीं पहुंच पाई है. इसका जीता जागता उदाहरण यह दो बहनें है. दिन भर इसी काम में रहने के कारण सोनी पढ़ाई नहीं कर पाती है. वो पढ़ना चाहती है, पर स्थिति अनुकूल नहीं है.
गवाह हैं आंकड़े
सरकारी आंकड़ों के हिसाब से राज्य में 58.7 प्रतिशत बच्चे अनपढ़ है. जिनमें 45.2% बालक वर्ग 68.3% बालिका वर्ग शामिल है. यह आंकड़ा 14 से 18 आयु वर्ग के बच्चों का है.

