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आसमानी बिजली का कहरः 8.89 लाख बार गिरी बिजली, हो चुकी है 230 की मौत

by bnnbharat.com
May 30, 2020
in समाचार
आसमानी बिजली का कहरः 8.89 लाख बार गिरी बिजली, हो चुकी है 230 की मौत
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खास बातें:-

  • एक अप्रैल से 2019 से 31 मार्च 2020 का तक का है आंकड़ा

  • सबसे अधिक 2.24 लाख बार पूर्वी सिंहभूम में गिरी बिजली

  • इंटर क्लाउड और क्लाउड टू ग्राउंड बिजली से दक्षिणी और पूर्वी झारखंड सबसे अधिक रहे प्रभावित

रांचीः झारखंड में ठनका से बचाव के माकूल इंतजाम नहीं हो पाया है. एक अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 तक झारखंड में आठ लाख 89 हजार 96 बार बिजली गिरी. इसमें सबसे अधिक पूर्वी सिंहभूम में 2.24 लाख बार बिजली गिरी.

इंटर क्लाउड और क्लाउड टू ग्राउंड बिजली से सबसे अधिक दक्षिणी और पूर्वी झारखंड के क्षेत्र प्रभावित रहे. अब तक आसमानी बिजली से 230 लोगों की मौत हो चुकी है.

पांच जिले ठनका के लिए सबसे खतरनाक

झारखंड में रांची, खूंटी, हजारीबाग, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम ठनका के लिए सबसे खतरनाक माने गये हैं. पांचों जिले थंडरिंग जोन में हैं. इन जिलों में ठनका गिरे, तो जान आफत में आ सकती है.

थंडरिंग जोन की पहली श्रेणी में हजारीबाग है. झारखंड में दो तरह के थंडरिंग जोन हैं. इसमें लो क्लाउड (कम ऊंचाई के बादल) और माइक्रोस्पेरिक थंडरिंग शामिल हैं.

लो क्लाउड थंडरिंग धरातल से 80 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर होती है, जबकि माइक्रोस्पेरिक थंडरिंग की गतिविधि धरातल से 80 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर होती है. लेकिन राज्य सरकार प्रदेश में लाइटनिंग (ठनका) से बचाव के लिए अब तक माकूल इंतजाम नहीं कर पायी है.

मुआवजा में खर्च हो चुका है 10 करोड़

ठनका से हुई मौत पर मुआवजा देने के एवज में सालाना लगभग 10 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. ठनका से मौत होने पर मृत व्यक्ति के परिजन को चार लाख रुपये देने का प्रावधान है.

जानवर की मौत पर 30 हजार रुपए, घर के नुकसान पर 95500 रुपए पूर्ण अपंग होने पर चार लाख रुपए और 50 फीसदी अपंग होने पर दो लाख रुपए मुआवजा देने का प्रावधान है.

ठनका से बचाव के लिए कई योजनाएं भी बनी

सरकार ने ठनका से बचाव के लिए कई योजनाएं बनायी, लेकिन योजनाएं ठनका प्रभावित इलाकों में धरातल पर नहीं उतर पायीं, सिर्फ देवघर में छह और रांची के नामकुम में एक तड़ित रोधक यंत्र ही लगाया जा सका. योजना के तहत रांची के पहाड़ी मंदिर और जगन्नाथपुर मंदिर में भी तड़ित रोधक यंत्र लगाया जाना था.

क्यों बनी थी तड़ित रोधक यंत्र लगाने की योजना

आपदा विभाग का तर्क था कि पहले जो तड़ित चालक लगाये जाते थे, वह छत या भवन के उपरी हिस्से में तांबे का त्रिशुलनुमा यंत्र लगा होता था. इसी के सहारे अर्थिंग को जमीन के अंदर ले जाया जाता था, लेकिन यह उतनी कारगर साबित नहीं हो पाई. जबकि तड़ित रोधक ठनका को भूमिगत करने में सक्षम है.

क्या है तड़ित रोधक

तड़ित रोधक में एक एम्मी मीटर लगा होता है, जो एक इलेक्ट्रॉनिक फील्ड बनाता है. यह बिजली बनने से पहले ही उसे नष्ट कर देता है. यह यंत्र 240 मीटर की परिधि को कवर करने में सक्षम है. एक तड़ित रोधक लगाने में डेढ़ से दो लाख रुपये तक का खर्च आता है.

देशभर में 400 से अधिक जिले हैं वज्रपात प्रभावित

वर्तमान में देश के 400 से ज्यादा जिले वज्रपात प्रभावित हैं. ये जिले वज्रपात के करंट तीव्रता के स्केल वन के क्षेत्र में आ चुके हैं. इन जिलों में करंट की तीव्रता 1.3 बिलियन वोल्ट नापी जा चुकी है. झारखंड सहित उत्तर प्रदेश बिहार, मध्य प्रदेश इनके मैदानी पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों में वज्रपात के कारण हुई मौतों की संख्या में अचानक भारी वृद्धि हुई है.

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकार भी नहीं कर रहा काम

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकार भी काम नहीं कर रहा. 2016 के बाद से अब तक प्राधिकार की बैठक भी नहीं हो पाई है, वहीं जिला आपदा प्राधिकार भी काम नहीं कर रहा है.

वर्ष 2014-15 में जिला आपदा प्रबंधन पदाधिकारियों की भी नियुक्ति भी की गई थी. संविदा के आधार पर हर जिले में जिला आपदा प्रबंधन पदाधिकारी की तैनाती की गई थी, लेकिन कॉन्ट्रैक्ट रिन्वल नहीं होने के कारण यह योजना भी सफल नहीं हो पाई.

क्या कहते हैं कर्नल संजय श्रीवास्तव

वज्रपात सुरक्षा अभियान के कर्नल संजय श्रीवास्तव के अनुसार वज्रपात सुरक्षा अभियान लॉन्च किया गया है, यह अभियान 2019 से 2021 तक चलेगा.

इस अभियान के जरीए वज्रपात से होने वाली मौत को तीन साल के अंदर 80% कम किया जा सकेगा.

इस साल ठनका से कितने की मौत

  • फरवरी 2020- 05 मौत
  • मार्च 2020- 07 मौत
  • अप्रैल 2020- 17 मौत
  • पांच से छह मई 2020 तक- 03  मौत

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