रांची : राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में 2018 में ‘मानव तस्करी के 373 मामले दर्ज किए गए – जो देश में सबसे अधिक है. इनमें से 314 मामलों में नाबालिग लड़कियों की तस्करी हुई है. हालांकि यह दो साल पुराना आंकड़ा है, पर इससे झारखंड में मानव तस्करी के भयावह हालात का पता चलता है.
कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए की गयी देशव्यापी तालाबंदी भारत जैसे कम आय और स्वास्थय के कमजोर बुनियादी ढांचा वाले देश के लिए विनाशकारी साबित हुए हैं. भारत ने जो तालाबंदी लागू की इससे प्रवासी श्रमिकों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को लंबी पैदल यात्रा करके घर वापस जाना पड़ा. झारखंड में सेव द चिल्ड्रन द्वारा 595 घरों का सर्वेक्षण किया गया. इससे मिले रिपोर्ट से पता चलता है कि 65% घरों में तालाबंदी के दौरान और बाद में किसी भी तरह के आजीविका के अवसरों का अभाव हो गया है. स्कूलों में बच्चों की शिक्षा बंद हो गई है. 38 प्रतिशत बच्चें, जिनमें ज्यादातर आंगनबाड़ी केंद्रों से हैं उन पर प्रतिकूल असर पड़ा है. सरकारी स्कूल भी वर्चुअल माध्यम से पढ़ाई करा रहे हैं.
इसलिए यदि हम COVID-19 पर युद्ध जीतते हैं, तो अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित होने में लंबा समय लगेगा, असंगठित क्षेत्र को अधिक समय लगेगा. नकदी की कमी और नौकरी के नुकसान के परिणामस्वरूप एक गंभीर आय का संकट हो रहा है. दैनिक-मजदूर, श्रमिक आजीविका के गंभीर संकट से गुजर रहे हैं.
कृषि क्षेत्र में छोटे और सीमांत किसानों, कृषि श्रमिकों, भूमिहीन मजदूरों की हालत ज्यादा खराब हो रही है.
जो बेरोजगार प्रवासी अपने गांवों में लौट आए हैं, उनके पास शायद ही कोई खेती योग्य ज़मीन है. ज्यादातर प्रवासी भूमिहीनता की वजह से ही पलायन पर मजबूर हुए थे. और ऐसे में जो लौटकर आये हैं उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है. गाँवों में कोई भी नौकरी उपलब्ध नहीं होने के कारण, हजारों लोग घर बैठे बेकार हो गए हैं. इन सभी की निर्भरता अल्प बचत पर है. उनकी छोटी-सी बचत भी कुछ ही समय में खतम हो जायेगी.
COVID-19 की वजह से स्कूल बंद रहने और माता-पिता की आजीविका के नुकसान के कारण,बच्चों का तस्करों के शिकार होने का जोखिम बढ़ सकता है. अब यह प्रतीत हो रहा है कि स्कूल अनिश्चित काल के लिए बंद रहेंगे. इससे शहरों से वापस लौटने वाले और जो गांव में ही रह गए थे वे बच्चे मानव तस्करों के शिकार हो सकते हैं. बच्चों की शिक्षा भी दांव पर होगी. इससे बच्चे अपराध के प्रति आकर्षित भी हो सकते हैं. स्कूलों को बंद करने और आजीविका के नुकसान के साथ स्थिति खराब हो सकती है. तस्करी और बाल विवाह की वजह से NFHS4 के अनुसार, 39 % की उच्च दर के साथ लड़कियों की तस्करी होने की संभावना बढ़ जाएगी.
ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समिति (वीएलसीपीसी) के रूप में ग्रामीण निगरानी समितियों जैसी पहल को पूरे राज्य में सक्रिय करने की आवश्यकता है. शहरी स्तर पर भी ऐसी ही समितियों का गठन किया जाना चाहिए ताकि बच्चों को बचाया जा सके. राज्य को झारखंड कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (JSCPCR) को फिर से स्थापित करना चाहिए, जो 31 मार्च 2019 से गैर-कार्यात्मक है. इस तरह के संवैधानिक निकायों और समुदाय आधारित संरचनाओं के जरिये बच्चों की तस्करी को रोका जा सकता है. सरकार और नागरिक समाज दोनों संगठनों द्वारा एक केंद्रित प्रयास इस सामाजिक खतरे से निपटने के लिए समय की आवश्यकता है.

