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अपने धर्म के साथ दूसरों के धर्म का भी सम्मान करते थे मालवीय: स्वामी रंजन

उनका स्पष्ट मानना था जो दूसरे के धर्म का सम्मान नहीं करता वह अपने धर्म का सम्मान नहीं कर सकता है.

by bnnbharat.com
May 3, 2020
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अपने धर्म के साथ दूसरों के धर्म का भी सम्मान करते थे मालवीय: स्वामी रंजन

अपने धर्म के साथ दूसरों के धर्म का भी सम्मान करते थे मालवीय: स्वामी रंजन

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रांची: अभाविप झारखंड द्वारा चलाए जा रहे लेक्चर सीरीज में रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख स्वामी रंजन का बौद्धिक “हिंदू राष्ट्र के भविष्य दृष्टा महामना पंडित मदन मोहन मालवीय” के ऊपर हुआ. अपने बौद्धिक व्याख्यान के क्रम में उन्होंने कहा कि भारत भूमि कई महान ऋषि महर्षि  की तपोभूमि रही है. स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, लाला लाजपत राय, महर्षि अरविंद, महामना मदन मोहन मालवीय ऐसे सैकड़ों महापुरुष का कालखंड भारत को एक नई दिव्य दिशा देने में सहायक रही है. महामना भारत रत्न इसी श्रृंखला में थे. उन्होंने कहा कि मालवीय धर्म सापेक्ष थे अपने धर्म के साथ दूसरों के धर्म का भी सम्मान करते थे उनका स्पष्ट मानना था जो दूसरे के धर्म का सम्मान नहीं करता वह अपने धर्म का सम्मान नहीं कर सकता है.

मालवीय की भविष्य दृष्टि अद्भुत थी. भारत के समग्र व्यवस्था को संभालने के लिए, उच्च शिक्षायुक्त तरुण की आवश्यकता को समझते हुए वे युवाओं से कहते थे सभी के अंदर सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, विद्या अर्जित करने के गुण,  रग रग में देशभक्ति एवं आत्म त्याग की मनोवृति होनी चाहिए.

मालवीय प्रत्येक रविवार को गीता प्रवचन करते थे और हमें क्या करना चाहिए इस नाते से गीता को सरल करके बताते थे. महामना की एक स्मृति प्रकाशित हुई थी उसमें नरदेव शास्त्री ने लिखा है, कहते हैं कि 1 दिन मसूरी में छात्रों का एक समूह महामना के पास आया, मालवीय जी से संदेश मांगने पर उन्होंने कहा कि छात्रों के लिए तीन संदेश तुम लोगों के लिए है, संदेश है शक्ति, शक्ति और शक्ति. छात्रों ने कहा कि हमने समझा नहीं. तब उन्होंने कहा पहला शारीरिक शक्ति, दूसरा मानसिक शक्ति और तीसरा आत्मिक शक्ति. इन तीनों शक्तियों का संपादन करो. सुंदर संक्षेप में महामना ने उन छात्रों को ही नहीं हमको भी संदेश दिया है.

उनका छात्रों, देश और समाज के लिए दिल धड़कता था. उन्होंने विश्वविद्यालय ध्यान रख हिंदी में कई कविता भी लिखि. बीए करने के बाद आगे का अध्ययन को स्थगित करना पड़ा क्योंकि घर में गरीबी थी, नौकरी के लिए गवर्नमेंट हाई स्कूल में पढ़ाया.

उनका भाषण सभी को सम्मोहित करने वाला था. एक बार एक सभा में उनके भाषण को सुन कर सभी सम्मोहित आनंदित हो गए. इलाहाबाद के बगल के एक जिला है प्रतापगढ़ के राजा रामपाल सिंह भी बहुत प्रभावित हुए. राजा इंग्लैंड से अध्ययन करके आए थे, विदेश में रहे, वहां पढ़े तो इसलिए उनका रहन सहन विदेश से प्रभावित था. मगर सच्चे देश भक्त की तरह कार्य करते थे. उनकी एक साप्ताहिक पत्रिका निकालती थी “हिंदुस्तान” नाम का. उनकी इच्छा थी कि अगर मालवीय जैसे नौजवान हमारे साथ जुड़ जाएं और हिंदुस्तान का संपादन का भार स्वीकार कर ले तो कितना अच्छा होता. मालवीय के सामने राजा रामपाल सिंह ने अपने मन की बात कही. मालवीय के मन में एक संका थी विदेशी रहन सहन वाले राजा के साथ कैसे कार्य करेंगे. इसलिए राजा साहब के प्याले और मालवीय के पंचामृत का मेल कैसे हो सकता है. जब बात हुई तो फिर मालवीय जी ने उनके सामने एक शर्त रखी, राजा साहब के सामने कहा कि मैं हिंदुस्तान का संपादन का भार इस शर्त पर स्वीकार करूंगा कि जब आप मद्यपान किए हुए हो तब आप मुझे नहीं बुलाएंगे और नहीं वार्ता करेंगे. राजा साहब के लिए यह एक कठिन काम था, लेकिन हीरे को खोना नहीं चाहते थे. उन्होंने कहा कि मुझे यह शर्त स्वीकार है. यह कितनी महत्वपूर्ण बात है कि जो नौकरी करने वाला है वह अपने पालक के ऊपर उसकी शर्त रख रहा है और पीएसएलएसएल भी शर्त स्वीकार कर रहा है. दोनों ही कहा जाए कि महापुरुष हैं. मालवीय ने लेखनी कि जिम्मेवारी उठा ली और राजनीतिक समस्याओं पर लेखन, भाषा की शुद्धता इन सब के कारण से हिंदुस्तान पत्रिका बहुत अच्छा चलने लगा. एक दिन राजा जी शराब ले चुके थे, अति आवश्यक कार्य के लिए सलाह लेने के लिए मालवीय जी को उन्होंने याद किया और सहायता से उनसे वार्ता की. वार्ता के बाद मालवीय ने कहा अब से मेरा अन्न जल यहां से उठ गया. आपके साथ जो शर्त थी वह टूट गई. अब यहां चला जाऊंगा. आप अपने पत्रिका के संचालन की व्यवस्था करें. आपकी उदारता के लिए धन्यवाद. राजा को तनिक भी आभास नहीं था कि ऐसा हो जाएगा, बहुत मनाया मालवीय को लेकिन मालवीय जी कहां मानने वाले थे. मालवीय कोई पैसे के लिए संपादक नहीं कर रहे थे. अपने मूल्यों के लिए उन्होंने संपादन का कार्य स्वीकार किया था.

राजा साहब ने उनको कहा कि आप वकालत करनी पड़ेगी. मैं आपको ढाई ₹ 250 प्रति महीने में भेजूंगा. उन्होंने वकालत के लिए मना किया लेकिन वह नहीं माने तो मालवीय जी को स्वीकार करना ही पड़ा.

मनुष्य को कठिनाइयों का सामना करने से ही फल प्राप्त होता है. जिस मनुष्य को कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता उसमें यथार्थ फल उत्पन्न नहीं होता. संसार में जितने मनुष्यों ने यह जितनी जातियों ने बड़े कार्य सिद्ध किए हैं उन सभी को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है. जितना बड़ा कार्य होता है उसके सिद्ध होने में उतनी ही बड़ी कठिनाइयां होती है और उतना ही अधिक उसमें स्वार्थ का त्याग करना होता है. सिद्धि प्राप्ति के अनंतर उससे उतना ही यश प्राप्त होता है.

वाकलत पूरी होने पर उनकी प्रैक्टिस खूब जम कर चलने लगी और भी एक जाने-माने अधिवक्ता के रूप में प्रख्यात हो गए. न्यायाधीश भी उनके कायल रहते थे.

धन का मोह त्याग कर देश के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए वह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद गए. 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन कि घोसना कर दी, इस आंदोलन के कारण अनेक प्रकार की उथल पुथल मची थी, चौरी चौरा की घटना में 21 पुलिस वाले जल गए बाद में इस घटना के कारण सत्याग्रह स्थगित कर दिया, जिसमें 225 लोग नामजद हुवे जिसमें 170 को फांसी की सजा सुनाई, मुकदमा इलाहाबाद हाई कोर्ट में आया, तब मोती लाल नेहरू और सभी ने इस मामले की लड़ाई कोर्ट में लड़ने के लिए महामना का नाम सुझाया और सफलता वहीं दिला सकतें ऐसा कहा. सभी ने उनसे आग्रह किया, उन्होंने कहा मै वर्षों पहले वकालत छोड़ दी है. लोगो के आग्रह पर मुकदमा लड़ना स्वीकार किया और अपनी दलीलों के बल पर सरकारी वकील को निरुत्तर कर दिए. जो देश का काम है वो मेरा काम है ये समर्पण का भाव उनके अंदर था. एक ओर स्वतंत्रा का भाव चल रहा था, एक और समाजिक दोष के कारण भी ढेरों क्षति हो रही थी. वे जाति प्रथा, और छुवा छूत के विरोधी थे, और इसे गैर हिन्दू कार्य कहा करते थे. अंत्योधार विधि में, उन्होंने कहा जन्म के आधार पर छुवा छूत नहीं होना चाहिए.

गंगा के दशामेघ घाट पर सभी को मंत्र दीक्षा के लिए आमन्त्रित करते जिसके सभी जाती वर्ण के लोग भाग लेते थे. इसी श्रृंखला में 1928 में कांग्रेस अधिवेशन के समय हुगली नदी के किनारे मंत्र दीक्षा दी. 1936 को नासिक में गोदावरी के किनारे हजारों लोगों को दीक्षा दी. भारत वर्ष सनातन महासभा में एक क्रियात्मक प्रस्ताव छुंवा छूत के विरोध में पास किया.

महापुरषों की कथनी और करनी एक होती है. एक बार छपरा में हिन्दू महासभा के कार्यक्रम के बाद जब कार्य में बैठ गए तब जग जीवन राम पहुंचे आगे के पढ़ाई के लिए उनसे आग्रह किया, तब उन्हें हिन्दू विश्व विद्यालय में अपने बेटे के साथ पढ़ने की व्यस्था कर दी.

हिन्दू समाज को संगठित और संस्कारित करने के लिए हिन्दू धर्म और समाज को व्याख्यायित किया. मालवीय का जीवन पूज्य आदर्श जीवन है, हम उनके जीवन से प्रेरणा ले कर हम अपने जीवन को देश भक्ति और समाज सेवा के लिए अर्पित करे. उन्होंने समाज के लिए कहा ग्राम ग्राम सभा कार्य होना चाहिए.

इस व्याख्यान को 9500 लोगों ने 1 बजे तक देखा तथा इसकी पहुंच 30000 लोगों तक हुई. तत्काल प्रतिक्रिया 750 लोगों ने दिया , 713 लोगों ने like और 216 लोगों ने शेयर किया.

इस दौरान प्रान्त अध्यक्ष प्रो नाथू गाड़ी, संगठन मंत्री याज्ञवल्क्य शुक्ला, प्रदेश मंत्री राजीव रंजन देव पांडेय, सोशल मीडिया के ऑल इंडिया को-कन्वेनर दीपेश कुमार, राष्ट्रीय मंत्री विनीता कुमारी, विशाल सिंह, सह मंत्री नवलेश कुमार, मोनु शुक्ला, मनोज सोरेन, बपन घोष, NEC सदस्यविनीत पांडेय, संजय मेहता, प्रदेश पदाधिकारी गण, विभाग संयोजक, जिला संयोजक, शिक्षक कार्यकर्ता सहित अन्य कार्यकर्ता गण लाइव उपस्थित थे.

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