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भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की हालत खराब, देश छोड़ने को मजबूर

by bnnbharat.com
April 2, 2021
in समाचार
भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की हालत खराब, देश छोड़ने को मजबूर
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पाकिस्तान में माइनॉरिटी की स्थिति बहुत ख़राब है पाकिस्तान में जो एथनिक माइनॉरिटी है न तो उनके मानवाधिकार की रक्षा हो रही है न ही रिलिजियस अल्पसंख्यकों की, हमने ने अपनी रिपोर्ट में पाया की पाकिस्तान में जो मुस्लिम अल्पसंख्यक है उनको तक नहीं बख्शा जा रहा है उनके लिए अल्पसंख्यक का मतलब हिन्दू सिख या क्रिश्चियन नहीं है बाकी जो बलोच है अहमदिया उन सब के लिए मानवाधिकार का मतलब कुछ नहीं है. एक इस्लामिक स्टेट के अंदर वैसे भी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए को मानवाधिकार नहीं होता है बांग्लादेश में इस्लाम एक स्टेट रिलीजन बना है.

पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश इस्लामिक स्टेट नहीं है लेकिन वहाँ भी फंडामेंटलिस्म बढ़ रहा है वहाँ माइनॉरिटी सुरक्षित नहीं रह सकती, जब 1947 में भारत के दो टुकड़े हुए तब पाकिस्तान में 12.5 परसेंट हिन्दू थे, उसमें से अकेले 23 परसेंट बांगलादेश में थे , ये डाटा 1951 का है. आज साल 2011 का डेटा देखते हैं तो 8 परसेंट हिन्दू बचे हैं बांग्लादेश में बाकी हिन्दू कहाँ गए , या तो वो मर गए या कन्वर्ट हो गए आखिर क्या हुआ उनके साथ.

पाकिस्तान में आज जितना हिन्दू होना चाहिए था. आज उतना हिन्दू नहीं है पाकिस्तान में , पाकिस्तान में हिन्दू की स्थिति बहुत ख़राब है महिलाओं का ख़ास तौर (हिन्दू सिख ) जो छोटी लड़कियां है उनका रेप कंवर्जन हो रहा है इसको एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे वो कंवर्ट हो जाये. ढाका यूनिवर्सिटीज के प्रोफेसर अबुल बरकत ने एक रिपोर्ट दी है जिसमें कहा है कि रोज 632 हिन्दू बांग्लादेश छोड़कर जा रहा है जो करीब हर साल 2 की संख्या होती है , ऐसे में 30 साल बाद बांग्लादेश में कोई हिन्दू नहीं बचेगा. आज साल 2021 है , अगले 25 साल बाद कोई हिन्दू नहीं बचेगा.

प्रेरणा मल्होत्रा कहते हैं कि 1.65 परसेंट हिन्दू है सिर्फ पाकिस्तान में यहां उनकी आबादी को लेकर हालात बेहद चिंताजनक है. सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार, सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स ने तिब्बत सहित पाकिस्तान ,बांग्लादेश ,अफगानिस्तान, मलेशिया ,इंडोनेशिया श्रीलंका की मानवाधिकार को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट को सभी देशों में नागरिक समानता, उनकी गरिमा, न्याय लोकतंत्र को आधार में रख कर तैयार किया गया है. यह रिपोर्ट शिक्षाविद, अधिवक्ता, न्यायाधीश, मीडियाकर्मी अनुसंधानकर्ताओं के एक समूह ने तैयार किया है.

पाकिस्तान

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट में पाकिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई है. रिपोर्ट के अनुसार वहाँ धार्मिक अल्पसंख्यको के साथ साथ अल्पसंख्यक शिया अहमदिया की स्थिति भी काफ़ी ख़राब है. वहाँ धारा 298 बी-2 के मुताबिक अहमदिया मुसलमानों द्वारा अज़ान शब्द का उपयोग भी अपराध है. इसके साथ साथ पाकिस्तान का कानूनी ढाँचा भी अंतरराष्ट्रीय नागरिक राजनीतिक अधिकारियों के अनुरूप नहीं है. वहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों- हिंदू, सिख ईसाई धर्म की युबा महिलाओं के साथ अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्मपरिवर्तन आदि घटनाएं काफी है. इसके साथ साथ धार्मिक अल्पसंख्यक को डराया धमकाया भी जाता है.

तिब्बत

रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न प्रतिबंधों के माध्यम से चीन तिब्बत में मानवाधिकार की स्थिति को छुपाने की कोशिश करता रहा है. इसके साथ साथ चीन तिब्बत की सामाजिक, धार्मिक, संस्कृतिक भाषाई पहचान भी खत्म करने की कोशिश कर रहा है.

बांग्लादेश

बांग्लादेश में भी मानवाधिकार धार्मिक अल्पसंख्यको की स्थिति भी बेहतर नहीं है. ढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अबुल बरकत की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 4 दशकों में 230612 लोग प्रत्येक वर्ष पलायन को मजबूर हो रहे है जिसका औसत 632 लोग प्रतिदिन है. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इसी गति के पलायन वहाँ होता रहा तो 25 साल बाद वहां कोई भी हिंदू नहीं रहेगा. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1975 में वहाँ संविधान संशोधित के मध्यम से सेकुलरिज्म शब्द को हटाकर कुरान की पंक्तियों को रखा गया 1988 में इस्लाम को देश का धर्म घोषित कर दिया गया. साथ ही चटगांव पर्वतीय क्षेत्र के डेमोग्राफी को भी योजनाबद्ध तरीके से बदल दिया गया. 1951 में 90 फ़ीसदी लोग यहाँ बौद्ध थे जो 2011 में घटकर55 फीसदी रह गया.

मलेशिया

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार मलेशिया में भूमिपुत्र के पक्ष में विभेदकारी कानून है. यह सजातीय अल्पसंख्यको के भी अधिकारों का हनन हो रहा है.

अफगानिस्तान

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में भी मानवाधिकार अल्पसंख्यको के प्रति विभेदकारी नीति पर चिंता व्यक्त की गई है. अफगानिस्तान के संविधान के अनुसार कोई मुस्लिम व्यक्ति की देश का राष्ट्रपति प्रधानमंत्री बन सकता है. 1970 की जनसंख्या के अनुसार वहाँ 700000 हिंदू सिख थे जो कि हालिया दिनों में सिमटकर सिर्फ 200 हिंदू सिख परिवार रहा गया है.

श्रीलंका

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स ने श्रीलंका में भी मानवाधिकार धार्मिक अल्पसंख्यको की स्थिति पर चिंता जताई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 26 साल तक चले गृह युद्ध मे 100000 लोगों की जान गई 20,000 तमिल गायब हो गए.

इंडोनेशिया

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार इंडोनेशिया में भी पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक कट्टरता असहिष्णुता बढ़ी है. यहाँ सिर्फ6 देशों को ही पहचान दी गई है. 2002 में बाली में हुए धमाके में भी देश के ही एक बड़े धार्मिक इस्लामिक नेता का नाम आया था. 2012 में बालीनुर्गा हिंदुओं पर हमला सहित कई घटनाएं धार्मिक अल्पसंख्यको के ख़िलाफ़ देखने को मिली है.

धार्मिक अल्पसंख्यक को डराया जाता है

बांग्लादेश में हर साल पलायन को मजूर लाखों लोग

भूटान में सजातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन

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