रांचीः एमएलए सरयू राय ने कहा है कि सारंडा सघन वन क्षेत्र के भीतर रद्द अथवा परिसमाप्त लौह अयस्क पट्टा क्षेत्रों में उत्खनित अयस्क स्टॉक के बिक्री का मामला शाह ब्रदर्स अथवा एनकेपीके, रामेश्वर जूट मील, देबुका भाई भेल जी अथवा अन्य किसी पट्टाधारी से जितना जुड़ा हुआ है उससे अधिक यह मामला झारखंड सरकार के खान विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली एवं नियम कानून को धत्ता बताकर लिये जाने वाले निर्णयों से जुड़ा हुआ है. यह मामला किसी पट्टाधारी के नफा नुकसान का नहीं बल्कि राज्य के नफा नुकसान का है. इस संबध में निम्नांकित बिंदु विचारणीय है.
1.राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में लौह अयस्क की कीमत आसमान छू रही है. इसका कारण अंतराष्ट्रीय राजनीति के दबाव में आस्ट्रेलिया द्वारा चीन को की जा रही लौह अयस्क की आपूर्ति बंद कर देना है और दूसरा कारण झारखंड सहित देश के अन्य लौह खननधारी राज्यों में चल रही निजी व्यवसायिक खदानों का विगत 30 मार्च, 2020 से बंद हो जाना है. चीन दुनिया का सबसे अधिक इस्पात निर्माता देश है जिसकी उत्पादन क्षमता 850 मिलियन टन है. इसकी इस्पात फैक्ट्रियों को चलाने के लिए चीन दुनिया के अलग अलग खदानों से लौह अयस्क खींचने में लगा हुआ है.
2. उपर्युक्त कारणों से झारखंड की सीमा पर उड़ीसा के जोडा में आज का लौह अयस्क का भाव 7,500 रु प्रति टन है, जबकि इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस (आईबीएम) द्वारा निर्धारित लौह अयस्क की दर 800 रु प्रति टन है. ऐसी स्थिति में झारखंड सरकार रद्द अथवा परिसमाप्त लौह अयस्क पट्टा क्षेत्रों में जुड़े हुए लौह अयस्क के स्टाॅक को खुले बाजार में नीलाम करेगी तो उसे काफी अधिक कीमत मिलेगी वरना पट्टाधारी इसे आईबीएम की दर पर बेच देंगे और सरकार को राजस्व की हानि होगी.
3. खनिज समनुदान नियमावली-1960 की धारा 12 एचएच के अनुसार, परिसमाप्त खनन पट्टाधारियों को परिसमाप्ति की तिथि से 6 माह के भीतर लौह आयस्क को बेच देना है. धारा 12 एचएच में प्रावधान है कि पट्टाधारी अपने स्टाॅक की बिक्री 6 माह में नहीं कर पाता है तो उसे एक माह का अवधि विस्तार दिया जाएगा. जिसके अनुसार झारखंड के करीब आधा दर्जन लौह आयस्क पट्टाधरियों ने पट्टा परिसमाप्ति के पश्चात एक माह के भीतर अपने अयस्क का निष्पादन नहीं किया है तो अब उसे उस स्टाॅक को बेचने का अधिकार नहीं है. यह अधिकार अब राज्य सरकार में निहित हो गया है. इसलिए अब सरकार को ऐसे सभी स्टाॅक को नीलाम कर अधिक से अधिक धन राशि राज्य खजाने में लोने की कोशिश करनी चाहिए न कि पूर्व पट्टाधारियों को ही इसे बेचने का अधिकार दे देना चाहिए, जैसा कि खान सचिव ने अपना स्टाॅक बेचने के लिए शाह ब्रदर्स को अधिकृत कर दिया है.
4. जब किसी पट्टाधारी का लौह अयस्क पट्टा रद्द अथवा समाप्त हो गया है तो उसके साथ ही उसकी ‘वन स्वीकृति’ भी समाप्त हो गयी है. नियमों के अनुसार पड़े हुए स्टाॅक को बेचना भी खनन कार्य के दायरे में आता है इसलिए इन पट्टाधारियों को सारंडा वन क्षेत्र में खनन संबंधी कोई भी आर्थिक गतिविधि करने का अधिकार नहीं है. यह अधिकार एक मात्र सरकार को ही है, इसलिए खान सचिव द्वारा इसकी बिक्री का आदेश किसी पट्टाधारी को देना सर्वथा अनुचित है.
5. सारंडा का क्षेत्र के भीतर पट्टाधारियों के अयस्क का समुचित सत्यापन नहीं होने की स्थिति में अवैध खान की संभावना बढ़ गयी है. इनके स्टाॅक की प्रतिपूर्ति का एक मात्र तरीका अवैध खनन से हासिल अयस्क से ही हो सकता है.
6. सारंडा वन क्षेत्र में खनन गतिविधियों के साथ अपराधिक एवं उग्रवादी गतिविधियाँ चलाने की अनेक शिकायतें विगत दिनों मिली है. इनमें से कतिपय मामलों में मुकदमेें भी दर्ज हैं. खुले बाजार में लौह अयस्क का भाव और आईबीएम द्वारा तय किया गया भाव से जितना बड़ा अंतर है उससे काला धन पैदा होने और मनी लाॅड्रिंग की संभवना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस प्रकार इन मामले में परिवर्तन निदेशालय (ईडी), एनआईए एवं सीबीआई का हस्तक्षेप भी हो सकता है.
7. विगत 5 वर्षों से मैं लौह अयस्क के अवैध खनन के मामले उठाते रहा हूँ. जिसपर विगत सरकार ने संज्ञान नहीं लिया. अवैध खनन की जाँच के लिए भारत सरकार द्वारा गठित शाह आयोग (2010-13) के अनुशंसाओं को जानबूझकर झारखंड में लागू नहीं होने दिया गया. 2014 से 2015 के बीच शाह आयोग कीअनुशंसाओं के आलोक में कारवाई के लिए 4 उच्च स्तरीय समितियाँ सरकार द्वारा बनायी गयी. सभी समितियों ने एक-एक पट्टाधारी के खनन पट्टों की जाँच के बाद यह साबित कर दिया कि किस पट्टाधारी ने खनन के किन-किन नियमों का उल्लंघन किया है. इन नियमों का उल्लंघन अवैध खनन की श्रेणी में आता है परंतु शाह ब्रदर्स को छोड़कर किसी भी अन्य लौह अयस्क पट्टाधारी के विरूद्ध सरकार के अधिकारियों ने कारवाई नहीं होने दिया. नियमों का उल्लंघन कर अवैध खनन करनेवाले पट्टाधारी के पास बचा स्टाॅक अवैध खनन द्वारा उत्खनित स्टाॅक है. इसलिए सरकार को इन्हें अपने कब्जे में लेकर नीलामी कर देनी चाहिए और अपना बकाया वसूल लेना चाहिए.
8. खान विभाग के जो अधिकारी 2014-15 के बीच गठित 4 उच्चस्तरीय समिति में शामिल रहे हैं और विभिन्न खननकर्ताओं द्वारा नियमों का उल्लंघन करना साबित किया है उन अधिकारियों ने भी अवैध खनन करनेवालों खननकर्ताओं का चतुर्वेदी समिति के सामने उनकी दोष सिद्ध नहीं किया उनके ऊपर भी सरकार को कारवाई करनी चाहिए. इन्होंने करीब 7000 करोड़ रूपया का जुर्माना भी नहीं वसूला. उल्टे जुर्माना की राशि को काफी कम कर दिया.
9. 2014 के जून में जब वर्तमान मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ही मुख्यमंत्री थे तब 5 सदस्यों वाली एक समिति इन्होंने गठित किया जिसने सितंबर 2014 में अपना प्रतिवेदन सरकार को सौंप दिया अक्टूबर, 2014 से झारखंड में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो जाने के कारण तत्कालीन सरकार ने इस समिति द्वारा चिन्हित अवैध खननकर्ताओं पर कारवाई नहीं की जा सकी. उसके बाद 2014 के दिसंबर में बनी नयी सरकार पर कारवाई करने की जिम्मेदारी थी परंतु वह सरकार ने विगत 5 वर्षों में कारवाई करने के बदले अलग-अलग समितियाँ गठित करते रही. सभी समितियों ने अपने प्रतिवेदन में अवैध खनन और अवैध खननकर्ताओं को चिन्हित किया. अवैध करन का प्रमाण दिया, परंतु कोई कारवाई नहीं हुई. जबकि सारे सबूत विभाग की संचिकाओं में मौजूद थे.
10. अब वर्तमान मुख्यमंत्री के ऊपर यह दायित्व है कि अपने पूर्व के कार्यकाल में उन्होंने अवैध खनन को चिन्हित करने के लिए जिस 5 सदस्यीय समिति का गठन किया था उसकी अनुशंसा पर कारवाई करे और विगत 5 वर्षों में कारवाई नहीं करने के लिए दोषी अधिकारियों पर भी कारवाई करे.

