रांची:-निर्दलीय विधायक सरयू राय ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है और कहा है कि पंचम झारखंड विधान सभा के पावस सत्र में उपर्युक्त विषय के संबंध में पूछे गये मेरे अल्पसूचित प्रश्न के उत्तर में खान विभाग ने यह नहीं बताया कि 31 मार्च 2020 को परिसमाप्त राज्य के लौह-अयस्क पट्टाधारियों द्वारा उत्खनित अयस्क की कितनी मात्रा अवशेष रह गई है और राज्य सरकार नीलामी के माध्यम से इसका निस्तार करने के लिये क्या कर रही है ? हाल ही में खान विभाग के सचिव ने एक पट्टाधारी मे० शाह ब्रदर्स को उनके पास बचे लौह-अयस्क अवशेष को बेचने का निर्देश दिया है. जहाँ तक मेरी जानकारी है शाह ब्रदर्स का खनन पट्टा सरकार ने कतिपय अनियमितताओं के कारण 2019 में रद्द कर दिया था। परंतु सरकार ने अभी तक सत्यापन नहीं किया है कि शाह ब्रदर्स के पास लौह-अयस्क की कितनी मात्रा अवशेष है ? फिर भी फिर भी खान सचिव ने इन्हंे इसे बेचने का आदेश दे दिया है. जबकि राज्य के कतिपय अन्य परिसमाप्त लौह-अयस्क पट्टाधारियों के अवशेष अयस्क भंडार का सत्यापन खान विभाग की शंकर सिन्हा समिति ने कर लिया है और प्रतिवेदन खान विभाग को सौंप दिया है. परंतु इन परिसमाप्त पट्टों के विरूद्ध सत्यापित अवशेष भंडारों को बेचने का निर्देश खान सचिव ने नहीं दिया है.
खान सचिव का यह रहस्यमय आदेश आशंकाओं को जन्म देने वाला है. सारंडा वन क्षेत्र में सक्रिय कतिपय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुझे सूचित किया है कि शाह ब्रदर्स के रद्द किये जा चुके खनन पट्टा के विरूद्ध लौह-अयस्क का भंडार अवशेष है ही नहीं.यही कारण है कि खान विभाग की शंकर सिन्हा समिति ने सभी परिसमाप्त पट्टास्थलों पर जाकर अवशेष भंडार का सत्यापन किया, परंतु शाह ब्रदर्स के रद्द किये जा चुके पट्टा स्थल पर अवस्थित अवशेष लौह-अयस्क भंडार की उपलब्धता पर मौन साध लिया है. आखिर क्या कारण है कि अन्य सभी परिसमाप्त पट्टाधारियों के अवशेष भंडार का सत्यापन शंकर सिन्हा समिति ने किया परंतु शाह ब्रदर्स का नहीं किया ?

इसके अलावा शाह ब्रदर्स के तथाकथित अवशेष लौह-अयस्क भंडार को बेचने का खान सचिव का निर्देश नियमानुकुल नहीं है. यदि आगे अन्य परिसमाप्त पट्टाधारियों के अवशेष अयस्क भंडारों को बेचने का आदेश खान सचिव देते है तो यह संभावित निर्देश भी नियमानुकुल नहीं होगा. कारण कि खनिज समानुदान नियमावली के नियम 12 जी.जी. के अनुसार परिसमाप्त पट्टों के उत्खनित अयस्क अवशेष भंडार को बेचने का अधिकार पट्टाधारियों को मात्र 6 माह तक ही है.इस संबंध में एक माह की अवधि विस्तार का प्रावधान भी है. परन्तु 7 माह की अवधि बीत जाने के उपरांत यह दायित्व राज्य सरकार का हो जाता है कि वह अवशेष भंडार का राज्यहित मंे निस्तार किस भाँति करती है ? इस आलोक में खान सचिव द्वारा लौह-अयस्क के तथाकथित अवशेष भंडार को बेचने का मे० शाह ब्रदर्स को आदेश देना सही नहीं है, नियम के प्रतिकुल है.

अयस्क भंडारों की मात्रा के सत्यापन की प्रक्रिया के बारे मे सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट निर्देश है. शंकर सिन्हा समिति ने सत्यापन के दौरान इन निर्देशों का पालन किया है या नहीं, इसकी जानकारी ली जानी चाहिए. 2019 में ही रद्द किया जा चुका शाह ब्रदर्स का पट्टा हो या गत 31 मार्च 2020 को परिसमाप्त हुये अन्य आ पट्टे हों. इन पट्टाधारियों के पास अब वन स्वीकृति नहीं है, जिसके आधार पर वे वन क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियाँ संचालित कर सकें, भले ही यह आर्थिक गतिविधि अवशेष लौह अयस्क भंडार को बेचने के लिये ही क्यों नहीं हो. ऐसी गतिविधि के लिये खान सचिव द्वारा किसी परिसमाप्त या रद्द पट्टाधारी को निर्देश देना अनुचित एवं गैरकानूनी है. वन अधिनियम 1980 के नियम 2 और 3 एवं अन्य इस बारे में स्पष्ट हैं. खान सचिव ने इन नियमों की अवहेलना की है. इसके लिए उनसे स्पष्टीकरण पूछा जाना चाहिए और उनपर कारवाई होनी चाहिये. राज्य सरकार के वन विभाग की अनुमति के बिना कोई भी विभाग किसी भी प्रकार की आर्थिक गतिविधि वन क्षेत्र में संचालित नहीं कर सकता है.
मेरा सुझाव है कि राज्य सरकार वन विभाग के सक्षम अधिकारी सहित खान एवं वाणिज्य-कर विभाग के योग्य अधिकारियों का एक समूह गठित करे और इसकी देखरेख में रद्द/परिसमाप्त लौह-अयस्क पट्टों के विरूद्ध उत्खनित अवशेष अयस्क भंडारों का निस्तार करे.

