रांची: आर्थिक मामलों के जानकार सूर्यकांत शुक्ला ने कहा है कि खुदरा महंगाई बढ़ रही है और थोक महंगाई निगेटिव जोन में विचरण कर रही है. जून माह के लिए सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों में उपभोक्ता मूल्य आधारित खुदरा महंगाई 6.09 प्रतिशत रही है, जबकि इसी सप्ताह में कॉमर्स और उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी किये गये आंकड़ों में थोक महंगाई शून्य के नीचे 1.81 प्रतिशत यानि ऋणात्मक रही है. खुदरा महंगाई लोगों की जेब और घरेलू बजट पर असर डालती है, यह सीधे उपभोक्ता को प्रभावित करती है. थोक मुद्रास्फीति के निगेटिव जोन में होने का अर्थ है कि बाजार में मांग कमजोर है और निर्माता अपने उत्पादों के दाम निर्धारण करने की शक्ति खो रहे है. खुदरा महंगाई की रफ्तार अगर बैंकों के मियादी जमा पर मिलने वाले ब्याज दर से ज्यादा हो, तो यह बचतकर्ता की आय पर चोट करती है और बचत को हतोत्साहित करती है, आज के हालत ऐसे ही हो गये हैं, जिसमें रियल ब्याज दर निगेटिव हो गयी है.
सूर्यकांत शुक्ला ने कहा कि थोक मूल्य सूचकांक आधारित थोक महंगाई फैक्ट्री प्राइस से संबंधित होती है, जिस कीमत पर उत्पादकों से सीधे बड़े व्यापारी माल की खरीदी करते हैं, यह कीमत यानि डब्ल्यूपीआई मुद्रास्फीति यदि निगेटिव यानि शून्य से नीचे आ जाय, तो यह समझा जा सकता है कि कंपनी मालिक के मुनाफा की स्थिति क्या होगी. थोक महंगाई एक तरह से इस बात का संकेत देती है कि कर्मचारियों के वेतन बढ़ने वाले हैं या नहीं और नयी नौकरियां की संभावना को भी बताने वाले होते है.
उन्होंने कहा कि थोक मुद्रास्फीति का कमजोर रहना या निगेटिव जोन में रहना अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अच्छा नहीं माना जाता है. थोक मुद्रास्फीति और खुदरा मुद्रास्फीति के बीच ज्यादा गैप हो तो यह शासनतंत्र की विफलता को इंगित करता है. अभी यह गैप लगभग 8 प्रतिशत के बराबर है. उन्होंने बताया कि कृषि फसल की अच्छी संभावना से जानकारों द्वारा यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्षाजनित आपूर्ति व्यवधान के बाद दूसरी छमाही में खुदरा मुद्रास्फीति नरम हो जाएगी, तब यह गैप भी कम हो जाएगा और घरेलू बजट पर दबाव भी घट जाएगा.

