रांची:- झारखंड सहित देश के कई हिस्सों में आज सरहुल महापर्व मनाया जाएगा. प्राचीन भारतीय संस्कृति व सभ्यता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए देश के आदिवासी जनजाति समुदायों ने वसंत ऋतु के आगमन के साथ नव वर्ष के प्रारंभ में प्रकृति की आराधना एवं स्तुति एवं नमन के लिए करोड़ो आदिवासी जनजाति समुदाय आज पूरे ब्रह्मांड की पूजा करेंगे.
रांची झारखंड से युवा पाहन प्रमुख हलदर चंदन पाहन ने सरहुल महापर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा सरहुल महापर्व प्रकृति के प्रति प्रेम एवं शांति हरियाली और खुशहाली समृद्धि का प्रतीक है और इसे पूरा भारत वर्ष ही नहीं बल्कि विश्व में निवास करने वाले लाखों-करोड़ों आदिवासी विभिन्न प्रकार से मनाते हैं . झारखंड में इसे वसंत उत्सव के रूप में कई दिनों तक मनाया जाता है मुख्यता इसमें चैत मास अमावस्या के पश्चात प्रथम चंद्र दर्शन के तृतीय शुक्ल पक्ष को मनाया जाता है , जिसमें सरहुल के पूर्व संध्या को पाहन पूजार उपवास व्रत रखकर जल रखाई पूजा करता है एवं ब्रह्मांड के घनत्व गतिमान एवं पूरे वर्ष में होने वाले मौसम का पूर्वानुमान कर इस वर्ष होने वाले वर्षा ऋतु एवं कृषि की स्थिति का आकलन करता है.
साथ ही संसार में मानव जाति की उत्पत्ति करने वाले पूर्वजों जल के देवता केकड़ा और मछली की भी पूजा की जाती है . मुख्य रूप से इसमें विशुद्ध नदी के जल एवं जंगल के फूल एवं पत्ते को प्रयोग में लाएं जाते है . इसके पश्चात पाहन सरना स्थल में पूजा कर संसार की मंगल कामना और सृष्टि के प्रति आभार व्यक्त करते है. सभी ग्रामवासी पूरे श्रद्धा आस्था एवं भक्ति भाव से अपने अपने घरों में पूजा पाठ कर घर में बनाए गए पुआ पीठा पकवान एवं तपावन आदि चढ़ाकर अपने पूर्वजों को नमन करते हैं और सारे फूल को सभी अपने शीश में धारण कर खुशियां मनाते हैं.
पूजा पाठ के पश्चात सभी खानपान कर अपने अपने गांव टोला में सामूहिक गीत नृत्य कर आनंद व हर्षोल्लास के साथ फुल खोंसी के पश्चात इसका समापन किया जाता है.

