रंजीत सिंह
रांचीः राजधानी रांची का मोरहाबादी मैदान इन दिनों नौकरी की बाट जोह रहे लोगों के लिए धरनास्थल बना हुआ है. पंचायत सचिव अभ्यर्थी, जेटेट उत्तीर्ण और गृह रक्षक अभ्यर्थियों के अलग- अलग कैम्प है. बेरोजगारी का आलम यह है की अधिकांश युवा अपने योग्यता के मापदंड से नीचे की भी नौकरी करने को तैयार है. गृहरक्षक बनने की न्यूनतम योग्यता मैट्रिक है, लेकिन धरनास्थल पर बैठे 80% युवक- युवतियां स्नातक या उससे भी अधिक पढ़े लिखे है.
धनबाद के अजय रजक शिक्षक बनना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने बीएड की पढ़ाई की, हालात ऐसे हो चुके है कि गृह रक्षक की नौकरी के लिए उन्हें धरना देना पड़ रहा है. दीपक गोराई स्नातक है, कंप्यूटर में हार्डवेयर और नेटवर्किंग का कोर्स भी कर रखा है, इसके अलावे हाई जम्प में भी धनबाद के प्रतिनिधत्व कर चुके है, वे भी अपने सहयोगियों के साथ गृहरक्षक की नौकरी के लिए धरना दे रहे है.
आशा कुमारी, रेखा कुमारी, ललिता कुमारी, आरती कुमारी जैसी महिलाएं पीजी उत्तीर्ण करने के बाद भी गृहरक्षक की नौकरी के लिए सरकार के फैसले के इंतजार में है. डॉली परवीन अकाउंट और मोहम्मद सद्दाम रसायन शास्त्र जैसे विषय से स्नातक करने के बाद भी सरकार उन्हें गृहरक्षक के योग्य नही समझ रही है.
लोहरदगा के युगेश प्रजापति नेट उत्तीर्ण है और रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय क्षेत्रीय भाषा विभाग से पीएचडी कर रहे है, लेकिन रोजगार के लिए विद्यालय में शिक्षक बनने को तैयार है. मोहम्मद अफरोज आलम जामिया मिलिया से से पीजी और टीचर ट्रेनिंग कर झारखंड में शिक्षक बनना चाहते है. आशीष रंजन बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से पीजी है, वे भी शिक्षक नियुक्ति पत्र के इंतज़ार में है.
वहीं मेघनाथ कुमार, मुरारी कुमार दास की आयु लगभग 40 हो चुकी है, अगर उन्हें इस बार नियुक्ति पत्र नहीं मिलता है, सरकारी नौकरी की उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा. गोड्डा के अमर कुमार आनंद भी चालीस साल के है, और अविवाहित है, उन्हें आशा है कि सरकार उन्हें नौकरी देगी, जिसके बाद वो अपना घर बसा सकेंगे.
पंचायत सचिव अभ्यर्थियों का भी यही हाल है. पंचायत सचिव के लिए इंटर की योग्यता चाहिए, जबकि लगभग सभी अभ्यर्थी कहीं अधिक योग्यता के है. बोकारो के गुलाम हुसैन इंग्लिश में पीजी है. जमशेदपुर के सुमन्त महतो 3 डी एनीमेशन में स्नातक है. प्रेरणा एकाउंट में पीजी है तो बोकारो के गौरव विशाल मेडिकल और लैब टेक्नीशियन में स्नातक है. योग्यता के हिसाब से रोजगार नहीं मिलना राज्य के लिए शुभ संकेत नहीं है, स्थिति और भी दयनीय हो जाती है जब युवा अपने योग्यता को नजरअंदाज कर नीचे की नौकरी को मजबूर है और सरकार उन्हें वो भी देने में अक्षम साबित हो.

