दिल्ली: रेलवे की योजना है कि वर्ष 2021 के अंत तक 200 से भी ज्यादा मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों में पारंपरिक आईसीएफ कोच के बदले जर्मन तकनीक वाली एलएचबी कोच लगा दिए जाएं. सिर्फ यही कर देने से इन गाड़ियों में 25,600 सीटें बढ़ जाएंगी. ये बर्थ 21 नई ट्रेनों के चलने के बराबर होंगी.
1990 के दशक के अंत में जब जर्मन तकनीक वाले लिंक हॉफमैन बुश कोच देश में आए थे, तब इन डिब्बों को सिर्फ शताब्दी एक्सप्रेस में लगाया गया था. बाद में इसे यहीं कपूरथला स्थित रेल कोच फैक्ट्री में बनाया गया और पहली बार नई दिल्ली और मुंबई के बीच चलने वाली राजधानी एक्सप्रेस में लगाया गया था. उसके बाद धीरे धीरे देश के सभी राजधानी एक्सप्रेसों में यही डिब्बे लगाए गए.
जर्मन डिब्बा पारंपरिक भारतीय डिब्बे के मुकाबले दो मीटर ज्यादा लंबा होता है. इसलिए इसमें ज्यादा सीटें या बर्थें लगाई जा सकती है. जब किसी ट्रेन में एलएचबी डिब्बे लगा दिए जाते हैं तो बिना डिब्बा बढ़ाए ही ट्रेन में 100 से भी ज्यादा सीटें या बर्थ बढ़ जाती हैं.
रेलवे बोर्ड ने जो योजना बनाई है, उसके मुताबिक दिसंबर 2021 तक देश भर के 68 रेलवे डिविजनों की 200 से अधिक ट्रेनों में पारंपरिक आईसीएफ कोच को निकाल कर उसमें एलएचबी कोच लगा दिए जाएंगे. यदि एलएचबी कोच वाली कोई ट्रेन हो तो उसके 24 कोच वाली एक ट्रेन में औसतन 1160 बर्थें होती हैं.
ऐसा इसलिए कि हर स्लीपर और एसी थ्री डिब्बे में 8 अतिरिक्त बर्थ तो एसी 2 डिब्बे में 6 अतिरिक्त बर्थ होते हैं. रेलवे का हिसाब है कि एक ट्रेन में यदि एलएचबी कोच लगाया जाए तो उसमें औसतन 128 बर्थ बढ़ जाती हैं. यदि 200 ट्रेनों में नए कोच लगाए जाएंगे तो इन ट्रेनों में कुल 25,600 बर्थ की बढ़ोतरी हो जाएगी.
रेलवे का जो आईसीएफ कोच है, वह दुर्घटना के वक्त काफी घातक सिद्ध होती हैं. दरअसल, दुर्घटना के वक्त आईसीएफ कोच एक दूसरे के ऊपर चढ़ हैं, इसलिए हताहत होने वालों की संख्या काफी हो जाती है. एलएचबी कोच की यह विशेषता है कि दुर्घटना के वक्त ये डिब्बे एक दूसरे के ऊपर चढ़ते नहीं हैं. इसके अलावा ये कोच बड़े आराम से 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर दौड़ सकते हैं.
इस कोच के शौचालय पहले वाले कोच के मुकाबले बेहतर हैं. इसमें ऑटोमैटिक सिस्टम लगा है, इसलिए गंदगी नहीं फैलती. इस समय एलएचबी कोच का निर्माण रेलवे के कपूरथला, रायबरेली और चेन्नई स्थित कोच फैक्ट्रियों में बड़े पैमााने पर किया जाने लगा है.

