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आदिवासियों की प्रगति की दिशा में पथ निर्माण के लिए नयी तकनीक का उपयोग करना होगा-अर्जुन मुंडा

by bnnbharat.com
September 3, 2020
in समाचार
अर्जुन मुंडा ने रेलमंत्री के प्रति आभार जताया
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राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान सम्मेलन का उदघाटन

नयी दिल्ली .केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा है कि जनजातीय मामलों का मंत्रालय टीआरआई को अनुदान के तहत अनुसंधान के लिए 26 जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) को वित्तपोषित कर रहा है और देश भर में फैले प्रतिष्ठित सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के सहयोग से गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान में लगा हुआ है.  दिल्ली में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (आईआईपीए )परिसर में आईआईपीए के सहयोग से राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान की स्थापना की जा रही है. इन साझेदार संगठनों को एक्सीलेंस सेंटर के रूप में नामित किया गया है . मुंडा आज वेबिनार के माध्यम से  जनजातीय मामलों के लिए एक्सीलेंस सेंटर(सीओई) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि आज यहां नई दिल्ली के भारतीय लोक प्रशासन संस्थान  जैसे साझेदार संगठनों के साथ मिलकर व्यावहारिक मॉडल तैयार किया है, जो समस्या की पहचान, समाधान खोजने और कार्रवाई अनुसंधान के हिस्से के रूप में परियोजना के निष्पादन को अंतिम रूप देते हैं, जिसे नीतिगत पहलों द्वारा लागू किया जा सकता है .  मुंडा ने कहा कि आदिवासियों की प्रगति की दिशा में पथ निर्माण के लिए हमें तकनीक का उपयोग करना होगा. जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) द्वारा अनुसंधान हमारे जनजातीय विकास कार्यक्रमों को आगे ले जाने का आधार बनना चाहिए . उन्होंने कहा कि जनजातीय अनुसंधान संस्थानों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है और उनके अनुसंधान से भविष्य के विकास के लिए रोड मैप तैयार करने में मदद मिलेगी . उन्होंने जोर देकर कहा कि नीति और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच की कमियों को पहचानने में मदद करने के लिए नीति के लिए अनुसंधान मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए . जनजातीय अनुसंधान को न केवल जनजातीय जीवन और संस्कृति के मानवविज्ञान पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए बल्कि उनके द्वारा की गई प्रगति पर भी ध्यान देना चाहिए . टीआरआई के शोध से “मेरा वन- मेरा धन- मेरा उद्यम“ लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलनी चाहिए. क्योंकि, वन न केवल पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं बल्कि आदिवासी आजीविका में प्रमुख भूमिका निभाते हैं .      

 मुंडा ने कहा कि हमारी आदिवासी विकास योजनाएं बहुत गतिशील हैं. हम अतीत में कई बाधाओं से गुजरे हैं, लेकिन अब नई तकनीक की मदद से हम आगे बढ़ रहे हैं. आदिवासियों के लिए विकास योजना पर कैसे आगे बढ़ना है, यह अनुसंधान आधारित होना चाहिए. लाभार्थियों का आकलन सबसे महत्वपूर्ण पहलू है और सभी लाभ उन तक पहुंचना चाहिए . उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि नीति के लिए अनुसंधान और जनजातीय प्रशासन की संवैधानिक अवधारणा के बीच बेमेल है . हम विकास योजनाओं को ध्यान में रखते हुए आदिवासी शोध नहीं कर सके. हम नीति में अनुसंधान के हस्तक्षेप से चूक गए हैं.  उन्होंने सुझाव दिया कि प्रस्तावित राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान (एनआईटीआर) में भी छात्रों को आदिवासी विकास के प्रति शिक्षित करने के लिए एक शैक्षिक विंग होना चाहिए.

जनजातीय मामलों के मंत्रालय के सचिव  दीपक खांडेकर ने अपने संबोधन में कहा कि पहले जनजातीय अनुसंधान कार्य जनजातीय कार्य मंत्रालय में प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में किया जा रहा था लेकिन अब इसे मिशन मोड में चलाया जा रहा है. हमारे देश में लगभग 700 अनुसूचित जनजाति समुदाय और 75 पीवीटीजी हैं. हम इस बात पर फोकस करते रहे हैं कि उन्होंने अतीत में क्या किया है, लेकिन अब हमारा ध्यान इस बात पर है कि वे क्या करने की ख्वाहिश रखते हैं .  आईआईपीए ऐसे प्रतिबद्ध संगठनों में से एक है, जो स्वेच्छा से आदिवासी जीवन पर शोध करने के लिए आगे आया है . उन्होंने कहा कि आज के कॉन्क्लेव में कई राज्यों के जनजातीय मामलों के मंत्रियों सहित देश भर से 100 से अधिक प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं.

  अपने संबोधन में आईआईपीए के महानिदेशक एस एन त्रिपाठी ने आदिवासी विकास में आईआईपीए की भूमिका पर विचार व्यक्त किया.आईआईपीए जनजातीय प्रतिभा पूल पर काम कर रहा है और जनजातीय मामलों के मंत्रालय के साथ साझेदारी में टीआरआई को मजबूत करने का काम कर रहा है. इस कॉन्क्लेव में 10 रिसर्च पार्टनर अपने प्रोजेक्ट्स शेयर कर रहे हैं.  राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान (एनटीआरआई) का रोड मैप भी साझा किया जा रहा है.  जनजातीय कार्य मंत्रालय भी आईआईपीए के सहयोग से एनटीआरआई के साथ आ रहा है.  इससे पहले मंत्रालय के संयुक्त सचिव नवलजीत कपूर ने जनजातीय विकास मंत्रालय की विभिन्न चल रही और आगामी योजनाओं पर विस्तृत प्रस्तुति दी.    आईआईटी दिल्ली को अधिकतम सामाजिक-आर्थिक अंतराल वाले गांवों की पहचान करने के लिए डेटा एनालिटिक्स का उपयोग करके डेटा संचालित ढांचे के विकास के लिए एक परियोजना दी गई है, ताकि डेटा ड्राइव योजना बनाई जा सके.  इसी तरह एनआईटी राउरकेला, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, एनआईआरटीएच, जेएनयू, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, भासा, बीएएफ, फिक्की, एसोचैम एमपी, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड और अन्य राज्यों में आजीविका और स्वास्थ्य परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं.  कई अन्य नागरिक समाजों और कॉर्पोरेट्स ने आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल संरक्षण, जैविक खेती, कौशल विकास, जनजातीय संस्कृति के क्षेत्रों में जनजातीय के कल्याण के लिए एक साथ काम करने के लिए मंत्रालय के साथ साझेदारी की पेशकश की है.

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