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नवरात्रि के नौ दिन और वास्तु के नौ उपाय

by bnnbharat.com
October 14, 2020
in समाचार
नवरात्रि के नौ दिन और वास्तु के नौ उपाय
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BNN DESK: इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा बड़े ही भक्ति भाव से की जाती है. शारदीय नवरात्रि स्थापना से लेकर दशहरा तक का समय अत्यंत पवित्र और उत्साह से परिपूर्ण होता है. जगह-जगह माँ शेरावाली के पांडाल सजते है एवं श्रीराम की कथाओं का आयोजन बड़े सुंदर तरीके से किया जाता हैं. नवरात्रि में माँ दुर्गा की कृपा पाने के लिए हम उपवास, पूजा, अनुष्ठान आदि करते है जिससे जीवन में भय ,विघ्न और शत्रुओं का नाश होकर सुख-समृद्धि आती है. जिन भवनों में वास्तुदोष हो वहां सुख-शांति के लिए देवी माँ की पूजा से घर के वास्तुदोषों का शमन होता है और वहां उपस्थित सभी नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं.

वास्तु में मान्यता है कि नवरात्रि के दिनों में कन्याओं को देवी का रूप मानकर आदर-सत्कार करने एवं भोजन कराने से घर का वास्तुदोष दूर होता है और सुख-समृद्धि,ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है. मनुष्य प्रकृति रूपी कन्याओं का पूजन करके साक्षात भगवती की कृपा पा सकते हैं. इन कन्याओं में मां दुर्गा का वास रहता है. कन्या पूजन नवरात्रि पर्व के किसी भी दिन या कभी भी कर सकते हैं लेकिन अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है.

जहाँ माता का दरबार सजा रहे है वह जगह साफ़-सुथरी हो,धूल-मिट्टी,मकड़ी के जाले नहीं हो,ये नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाते है. पूजन कक्ष की दीवारें हल्के पीले, गुलाबी ,हरे, बैंगनी जैसे आध्यात्मिक रंग की हो तो अच्छा है,क्यों की ये रंग सकारात्मक ऊर्जा के स्तर को बढ़ाते है. काले,नीले और भूरे जैसे तामसिक रंगों का प्रयोग पूजा कक्ष की दीवारों पर नहीं होना चाहिए.

वास्तुविज्ञान के अनुसार मानसिक स्पष्टता और प्रज्ञा का दिशा क्षेत्र ईशान कोण यानि कि उत्तर-पूर्व दिशा को पूजा-पाठ के लिए श्रेष्ठ माना गया है. यहाँ माता रानी की पूजा करने से उपासक को पूजा का पूर्ण फल  मिलता है,घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहेगा.

धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है. कलश में सभी ग्रह नक्षत्रों एवं तीर्थों का वास होता है. इनके आलावा ब्रह्मा, विष्णु,रूद्र,सभी नदियों,सागरों,सरोवरों एवं तेतीस कोटि देवी-देवता कलश में विराजमान होते हैं. वास्तु के अनुसार ईशान कोण(उत्तर-पूर्व)जल एवं ईश्वर का स्थान माना गया है और यहां सर्वाधिक सकारात्मक ऊर्जा रहती है. इस दिशा में कलश रखने से जल तत्व से जुड़े वास्तुदोष दूर होकर सुख-समृद्धि आती ह.।

देवी माँ का क्षेत्र दक्षिण और दक्षिण पूर्व दिशा माना गया है इसलिए यह ध्यान रहे कि पूजा करते वक्त आराधक का मुख दक्षिण या पूर्व में ही रहे. वास्तु में शक्ति और समृद्धि का प्रतीक मानी जाने वाली पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से हमारी प्रज्ञा जागृत होती है एवं दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से आराधक को मानसिक शांति अनुभव होती है,घर के क्लेशों का नाश होता है.

नवरात्रि में दुर्गा माँ की पूजा-अनुष्ठान के दौरान पूजन कक्ष एवं मुख्य द्वार पर आम या अशोक के हरे-हरे पत्तों की बंदनवार लगाने से घर में नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करती,ध्यान रहे बंदनवार सूखने पर तुरंत दूसरी बाँध दें.

मातारानी की पूजा करते समय अखंड दीप को पूजा स्थल के आग्नेय यानि दक्षिण-पूर्व में रखना शुभ होता है क्योंकि यह दिशा अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करती है, ऐसा करने से आग्नेय दिशा के वास्तुदोष दूर होकर घर में रुका हुआ धन प्राप्त होता है. इसके अलावा आग्नेय कोण में अखंड ज्योति या दीपक रखने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा घर में सुख-समृद्धि का निवास होता है.

नवरात्रि के दिनों में संध्याकाल के समय पूजन स्थल पर शुद्ध घी का दीपक जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है,बुरी शक्तियां दूर भागती हैं घर के सदस्यों को प्रसिद्धि मिलती है व रोग एवं क्लेश दूर होते है.

पूजा कक्ष के दरवाज़े पर हल्दी,सिन्दूर या रोली से दोनों तरफ स्वास्तिक बना देने से माँ की कृपा प्राप्त होती है,वास्तु दोषों से उत्पंन बुरे प्रभाव दूर होते हैं. वास्तुशास्त्र के अनुसार शंख ध्वनि व घंटानाद करने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और आस-पास का वातावरण शुद्ध और पवित्र होकर मन-मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.

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