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पिता की दर्द भरी दास्तां…तुम्हारा नहीं, यह मेरा घर है बेटा

by bnnbharat.com
January 5, 2021
in समाचार
पिता की दर्द भरी दास्तां…तुम्हारा नहीं, यह मेरा घर है बेटा
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BNN DESK: “उफ! पापा जी आपने पूरा घर ही गंदा कर दिया. अभी-अभी राधा ने पोछा मारा था और आपने चप्पलों के निशान छोड़ दिए. थोड़ी तो समझ होनी चाहिए आपको? आप बच्चे तो हैं नहीं.”  बहू रिया के मुंह से ये शब्द सुनकर अनिल हतप्रभ से खड़े रह गए, कैसे पुलिस की नौकरी में सिर्फ उनकी एक आवाज बड़े से बड़े मुजरिमों को हिला कर रख देती थी और आज उनकी बहू उन्हीं के घर में इतना सुना रही है. तभी पत्नी ने उन्हें सोफे पर बैठाते हुए कहा “कोई बात नहीं जी, बहू की बातों का क्या बुरा मानना? बस जुबान की तेज है, बाकी उसके मन में ऐसा कुछ नहीं है.” 

अनिल ने पत्नी की आंखों में देखा जैसे पूछ रहे हों “सच में?” और फीकी सी हंसी उनके होठों पर तैर गई, लेकिन आंखों के कोर थोड़े से नम हो गये. सोफे पर बैठे-बैठे ही सोचने लगे कितने जतन से इस घर को खड़ा किया था, एक-एक तिनका अपने हिसाब से रखवाया था, इस घरौंदे का ताकि सेवा अवकाश के बाद पति पत्नी सुविधाओं के साथ आराम से रहेंगे, लेकिन आज सारी दुनिया उनके कमरे तक सिमट गई है, कमरे से बाहर निकलो तो कितना कुछ सुनना पड़ता था उन्हें, हॉल के अंदर फायर पिट बनवाया था कि ठंड के दिनों में वहां आग के सामने भुनी मुंगफलियां खाएंगे, लेकिन मजाल क्या कि बहू कभी सर्दी में आग जलाने दे,

बहू कहती थी कि पूरे घर में राख के कण फैलते हैं फिर वो चिमनी वैसी ही रंगी पुती दिखती थी एक दम उजली, क्योंकि बहू को वैसी ही पसंद थी. ये सब सोच रहे थे तभी पत्नी हाथ में कॉफी का मग लिए वहां उनके पास आ बैठीं, पति को बहुत अच्छे से जानती थीं, जानती थीं कि वो अभी गुस्से में थे और उनके हाथ की कॉफी पीकर उनका गुस्सा शांत हो जाता था.

पत्नी भी क्या करतीं, पति और बेटे सोमेश के मोह में फंसी एक भारतीय नारी जो ठहरी, दोनों तरफ बैलेंस बनाते बनाते ही उनका जीवन कट रहा था, कभी बेटे की सुनती कभी पति की. एक दिन सुबह सैर से लौटने के बाद पति पत्नी दोनों लॉन में बैठे थे, नौकर चाय रख के गया, दो की जगह तीन चाय का कप उन्हें थोड़ा अटपटा लगा क्योंकि उनके आलावा चाय सिर्फ सोमेश पीता था और वो उनके साथ कभी चाय नहीं पीता था, उसने उनके साथ बैठना तो कब का छोड़ दिया था फिर आज? 

तभी सोमेश वहां आ बैठा, साथ में चाय पीने लगा. लेकिन अजीब सी चुप्पी, ये वही सोमेश है जो छोटा था तो उसकी बातें खत्म ही नहीं होती थीं, अनिल कितना भी थके हों सोमेश के साथ खेलते ही थे, उसकी बातें तब तक खत्म नहीं होतीं जब तक कि वो उन्हें कहते कहते थक के सो नहीं जाता, आज अजीब सी औपचारिकता ने अपनी जगह बना ली थी बेटे और पिता के बीच. 

तभी पत्नी ने उस खामोशी को तोड़ा, कहा “सोमेश,  अगले महीने ही तो रिया के भाई के बेटी की शादी है ना?” “हां मां, उसी बारें में बात करने आया हूं, लड़के वाले इसी शहर के हैं और वो यहीं से शादी करना चाहते हैं सो रिया का परिवार शादी के लिए ये घर चाहता है, वो हमारे घर से शादी करना चाहते हैं, इसलिए मैं चाहता हूं कि जब तक भीड़ भाड़ रहेगी घर में तब तक आप दोनों दीदी के पास चले जाओ, आप दोनों को भी भीड़ भाड़ से असुविधा होगी और दीदी भी इसी शहर में हैं तो आप लोगों को कोई तकलीफ भी नहीं होगी, आप दोनों का कमरा भी उनके काम आ जाएगा.” 

ये सुनकर अनिल गुस्से से लाल हो गए, फिर भी अपनी आवाज को संयमित करके बोले “बहू के घर वालों को दूसरा घर दिला दो किराए पर, दस पंद्रह दिनों के लिए. हम क्यों शिफ्ट हों कहीं?”  “पापा आप भी ना गजब करते हो, रिया के घर वाले हैं. हमारे इतने बड़े घर के रहते उनके लिए दूसरा घर देखें! अब रिया ने उनसे कह भी दिया है, अब आप लोग अपना देख लो वो यहीं आएंगे.” कह कर सोमेश एक दम से अंदर चला गया, अंदर से बहू रिया की आवाज भी आने लगी, लग रहा था कि वो सब कुछ सुन रही थी और उसे अनिल की बात शायद अच्छी नहीं लगी थी.

आज पत्नी के आंखों से आंसू बह रहे थे और अनिल ने उन्हें अपना कंधा दिया, जैसे कह रहे थे कि अभी मैं हूं, सब ठीक कर दूंगा. दूसरे दिन शाम अनिल सैर से आए तो पत्नी ने बताया कि बेटा, बहू और बच्चों के साथ छुट्टी बिताने अपने ससुराल गया और बिना बताये… अनिल मुस्कुराने लगे और बोले “देख पगली, यही बच्चे होते जिनके लिए तू मुझसे लड़ती थी, जिनके लिए जाने कितनी रातें हमने जाग के बीता दीं. आज वो हमारे घर से हमें ही जाने को कह रहे हैं, कोई बात नहीं, मै भी इनका बाप हूं” कहकर अंदर चले गए. एक हफ़्ते बाद सोमेश परिवार के साथ लौटा तो दरवाजे पर ताला लगा था. चौकीदार बैठा उन्हें देखते ही उनके पास पहुंचा एक चाभी सोमेश के हाथों में दी और एक चिठ्ठी भी.

 चिठ्ठी खोल कर पढ़ने लगा, वो खत अनिल का था सोमेश के नाम,

 सोमेश,

 मैं और तुम्हारी मां रामेश्वरम जा रहे हैं, एक महीने बाद लौटेंगे, ये जो चाभी है तुम्हारे हाथ में वो घर की चाभी नहीं है, वो एक दूसरे फ्लैट की चाभी है, जिसमें तुम सभी का सामान रखवा दिया है, वो फ्लैट मैंने बहुत पहले खरीदा था, तुम्हें नहीं बताया था. पॉश इलाके में है तुम लोगों के लिए अच्छा है, अगर अच्छा ना लगे तो अपने हिसाब से घर लेना. ये घर मेरा और तुम्हारी मां का है और हमारा ही रहेगा, इसमें से हमें कोई नहीं निकाल सकता, अभी तक सब कुछ बर्दाश्त करता रहा था क्योंकि तुम्हारी मां खुश रहे, लेकिन अब तुम्हारी बातों से उसकी आंखों में आंसू आए ये मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता, ये हमारे सपनों का घर है जिसमें हम अपने बच्चों और नाती पोतों के साथ रहना चाहते थे, लेकिन शायद ईश्वर को ये मंजूर नहीं था और तुम लोगों को हमारा साथ पसंद नहीं था, वो घर मेरे और मां के तरफ से तुम लोगों के लिए आशीर्वाद स्वरूप है, इच्छा होगी तो रखना वरना वापस कर देना, माता पिता होने के नाते हम अपना आत्मसम्मान नहीं खो सकते, हमारे बाद ये घर ट्रस्ट का होगा, जो यहां वृद्ध आश्रम बनाएंगे, इस घर पर तुम्हारा या तुम्हारी बहन का कोई अधिकार नहीं होगा, मैंने ये बात तुम्हारी बहन को भी बता दी है और वो मेरे इस फैसले से खुश है, उम्मीद है तुम भी होगे. तुम सब खुश रहो,

 तुम्हारा पिता

खत खत्म होते ही सोमेश जड़ हो चुका था, आंखों में आंसू थे, लेकिन ये पता नहीं कि वो आंसू पश्चाताप के थे या बड़े से घर को खोने का या फिर इस एहसास के टूटने का कि पिता की जायदाद अंत में बेटे की ही होती है.

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