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1 जनवरी 1948 को आजाद भारत का जालियांवालाबाग हत्याकांड के रूप में जाना जाता है खरसावां गोलीकांड

by bnnbharat.com
January 1, 2021
in समाचार
खरसावां गोलीकांड के शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे सीएम हेमंत सोरेन
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खरसावां-सरायकेला के जनजातीय नहीं चाहते थे ओड़िशा में विलय, दो हजार से ज्यादा आदिवासियों की हुई थी मौत
रांची:-स्वतंत्र भारत में 1 जनवरी 1948 को खरसावां गोलीकांड की तुलना जालियांवालाबाग हत्याकांड से की जाती है. ओड़िसा मिलिट्री पुलिस की ओर से की गयी गोलीबारी में 35 आदिवासियों के मारे की पुष्टि हुई थी, लेकिन पीके देव की पुस्तक ‘मेमायर ऑफ ए बाइगोर एरा’ में दो हजार से ज्यादा आदिवासियों के मारे जाने का जिक्र है. कोलकाता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘द स्टेट्समैन’ ने 3 जनवरी 1948 के एक अंक में छापा ‘ 35 आदिवासीज किल्ड इन खरसावां’. हालांकि अभी तक इस गोलीकांड का कोई निश्चित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. इस गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया गया, पर आज तक उसकी रिपोर्ट कहा हैं, किसी को नहीं पता. इस गोलीकांड की याद में हर वर्ष एक जनवरी को शहीद सभा का आयोजन होता है और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है.
एकीकृत बिहार में खरसावां आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र था, जो उस समय एक रियासत हुआ करता था. देश के तत्कालीन सरदार वल्लभभाई पटेल ने देशी रियासतों को मिलाकर संघात्मक भारत का हिस्सा बनाने के लिए इन रियासतों को तीन श्रेणियों ए, बी और सी में बांटा. ए श्रेणी में भारत की बड़ी रियासतें, बी श्रेणी में मध्यम और सी श्रेणी में छोटी रियासतें थी. खरसावां भी एक छोटी रियासत थी. इस क्षेत्र में उड़ीसा भाषी लोगों की संख्या को देखते हुए केंद्र के दबाव में मयूरभंज रियासत के साथ-साथ सरायकेला और खरसावां रियासत का ओड़िसा में विलय का समझौता हो चुका था, लेकिन खरसावां-सरायकेला के आदिवासी नहीं नहीं चाहते थे सरायकेला और खरसावां का ओड़िसा में विलय हो. उन दिनों से ही आदिवासी अलग झारखंड राज्य की मांग कर रहे थे. 1 जनवरी 1948 को इन तीनों रियासतों के सत्ता का हस्तांतरण भी होना था, लेकिन इसके विरोध में और अलग झारखंड राज्य की मांग कर रहे आदिवासी समाज के 50 हजार लोग खरसावां में एकत्रित हो चुके थे. इस सभा में हिस्सा लेने के लिए जमशेदपुर, रांची, सिमडेगा, खूंटी ,तमाड़, चाईबासा और दूरदराज के इलाके से आदिवासी आंदोलनकारी अपने पारंपरिक हथियारों से लैस होकर खरसावां पहुंचे थे. आंदोलन के नेतृत्वकर्त्ता जयपाल सिंह मुंडा थे, लेकिन वे खुद उस दिन खरसावां नहीं पहुंचे. दूसरी तरफ ओड़िसा सरकार किसी भी हाल में खरसावां में 1 जनवरी को सभा नहीं होने देना चाहती थी और खरसावां हाट उस दिन ओड़िसा मिलिट्री पुलिस का छावनी बन गया था. वहीं कोई नेतृत्व नहीं होने के कारण भीड़ का धैर्य जवाब दे चुका था. इसी दौरान अचानक ओड़िसा मिलिट्री पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग की. इस गोलीकांड को लेकर सात दशक से अधिक समय बीत चुका है, कई जांच कमेटिया भी बनी, लेकिन आज तक इस घटना पर कोई रिपोर्ट नहीं आयी. खरसावां गोलीकांड का जनरल डायर कौन है, इसका आज तक कोई खुलासा नहीं हुआ.

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