रंजीत कुमार
1991 में जब भारत मे उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तब कांग्रेस के पी वी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह तत्कालीन वित्त मंत्री थे. उदारीकरण के साथ ही सरकार और आर्थिक विशेषज्ञों के द्वारा भारतीय जनमानस को खुशहाल और समृद्ध भारत के सपने दिखाए गए. भारत का बाजार विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया गया. आयात निर्यात के नियमों का भी सरलीकरण किया गया. अब भारतीय बाजार में विदेशी कंपनियों और उत्पादों का वर्चस्व था. उस समय के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने उदारीकरण के विरोध में मनमोहन सिंह पर जबरदस्त हमला बोला था. इस से आहत मनमोहन सिंह इस्तीफा तक देना चाहते थे. खैर किसी तरह उन्हें मना लिया गया.
भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में विरोध के साथ ही स्वदेशी जागरण मंच के द्वारा उदारीकरण के विरोध में शहर शहर आंदोलन किया गया. तर्क यहाँ तक दिया गया जब एक ईस्ट इंडिया कंपनी ने आकर देश को ग़ुलाम बना लिया था तो हज़ारो विदेशी कंपनियां देश का क्या हाल करेंगी. स्वदेशी जागरण मंच के लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बंधित थे. इसलिए बाद में जब भारतीय जनता पार्टी ने सरकार को आर्थिक मुद्दे पर समर्थन कर दिया तो विरोध का स्वर धीरे धीरे कमजोर हो गया. अब भारत की दो प्रमुख राजनीतिक शक्ति आर्थिक मुद्दे पर एकमत थी और देश विदेशी पूंजीनिवेश के सहारे आगे बढ़ रहा था.
जब वैश्विक महामारी कोरोना का भारत मे आगमन हुआ तब वर्तमान मोदी सरकार ने यूरोप और अमेरिका में कोरोना से नुकसान को देखते हुए लॉकडौन का निर्णय लिया, ताकि कोरोना के प्रसार को रोका जा सके.
लॉकडौन ने भारतीय अर्थव्यवस्था जो अब पूँजीवाद पर आधारित हो चुकी है, का एक ऐसा चेहरा देश के सामने ला दिया, जिसकी कल्पना भी आज की पीढ़ी नहीं की थी. जिन नई पीढ़ी के लोगो ने आसमान छूते भवनों, शॉपिंग काम्प्लेक्स, मॉल, मल्टीप्लेक्स को देखा था, उनलोगों ने न्यूज़ चैंनलों के द्वारा सड़क पर हज़ारो किलोमीटर पैदल या सड़क पर चलते मजदूर वर्ग को देखा। सड़क दुघर्टनाओं, पटरी पर मौत के मुँह में समाता मजदूर, पैदल चलती गर्भवती महिलाएं, नँगे पैर भूखे प्यासे छोटे छोटे बच्चे ये सवाल करते है कि अर्थव्यवस्था का जो मॉडल हमने चुना है वो इस देश के अनुरूप है?
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और उदारीकरण ने देश को जो सपने दिखाए थे कम से कम भारतीय मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग को इसने निराश किया है. अब जब प्रधानमंत्री मोदी स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहे है तो सवाल ये उठता है कि जो शक्तिशाली देश अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे संस्थाओं को नियंत्रित करते है क्या वो भारत के विशाल बाजार को भूल जाएंगे? क्या ऐसी शक्तियां भारत को स्वदेशी के सपने को पूरा करने में बाधक नही बनेगी? कर्ज़ आधारित अर्थव्यवस्था से निकलकर हम आत्मनिर्भर कैसे बनेंगे? क्या विदेशी पूंजीनिवेश के दम पर कोई देश आत्मनिर्भर बन सकता है?
देश के नीति निर्धारकों को इन सवालों का जवाब ढूंढना होगा.

