रांची: फर्जी सरेंडर मामले में अब नए सिरे से जांच-पड़ताल शुरू कर दी गई है. रांची के लोअर बाजार थाने में इस संबंध में मामला दर्ज है. इसका अनुसंधान अब नए सिरे से होगा. रांची पुलिस को निर्देश दिया गया है कि उस समय के एसएसपी रहे अधिकारियों से भी पूछताछ की जाए. साथ ही सीआरपीएफ के कोबरा बटालियन के कमांडेंट स्तर के अधिकारियों से भी रांची पुलिस सवाल-जवाब करेगी. पूछताछ पीड़ित युवकों से भी की जाएगी.
साथ ही यह भी चिन्हित करने का निर्देश दिया गया है कि इस मामले में कौन-कौन पुलिस अधिकारियों की भूमिका रही है. रांची के डीआईजी की अगुवाई में इसके लिए एसआईटी का गठन किया गया है.
वर्ष 2014 में रांची में 514 आदिवासियों को नक्सली बताकर पुराने जेल में रखा गया था. एक बड़े समारोह में इन सबों को समर्पण कराने की तैयारी की गई थी. पुराने जेल में इन युवकों को कोबरा बटालियन की सुरक्षा थी. साथ ही इन्हें नौकरी का लालच भी दिया गया था. समर्पण के बाद नौकरी के लिए प्रत्येक युवक से ढाई से ₹300000 रुपये अलग से वसूली की गई थी.
पैसा वसूली में अधिकारियों के कुछ दलाल भी शामिल थे. युवकों को न केवल प्रशिक्षित किया जा रहा था बल्कि उन्हें वर्दी भी सिलवाकर दी गई थी. युवकों ने जमीन बेचकर पैसे दिए थे. इनके भोजन मद का भुगतान उस समय सरकार की ओर से किया गया था. साथ ही जेल प्रशासन ने इसके लिए पत्र भी लिखा था.
उस समय सीआरपीएफ के आईजी एमवी राव थे. उन्होंने सीआरपीएफ के तत्कालीन डीआईजी के साथ जेल का दौरा किया था. अवैध तरीके से सरेंडर कराए जाने के मामले पर उन्होंने सरकार को पत्र लिखा था. साथ ही लिखा था कि कोबरा बटालियन, जो नक्सलियों के खिलाफ लड़ने के लिए है. उसका उपयोग फर्जी ढ़ंग से सरेंडर करने वाले युवकों की सुरक्षा में किया जा रहा है. उस समय आनन-फानन में लोअर बाजार थाना में प्राथमिकी दर्ज की गई. दिग्दर्शन इंस्टीट्यूट के अधिकारी और कुछ दलाल को जेल भेज दिया गया था.

