सूर्यकांत/अरबाज,
चतरा : जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहल पर देश भर में लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर विशेष जल संचयन अभियान चलाया जा रहा है ताकि भूगर्भ जल रिचार्ज हो. वहीं चतरा के सिमरिया में शासन और प्रशासन भी इस अभियान को शत-प्रतिशत धरातल पर उतारने को ले कर व्यापक अभियान में जुट गई है. नदी-तालाब व अन्य जलाशयों के साफ-सफाई पर भी विशेष अभियान चलाया जा रहा है. वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों के लापरवाही के कारण नदी-तालाब व अन्य जलाशय दूषित हो गए हैं. इतना ही नहीं ये वैसे जलाशय हैं जिसके घाट से वहां रहने वाले लोगों और जानवरों दोनों की प्यास बुझती है.
ऐसा नहीं है कि नदियों व तालाबों के पानी से लोग प्यास नहीं बुझाते हैं. कई बार आपलोगों ने भी लोगों को नदियों के पानी से अपनी प्यास बुझाते देखा होगा. लेकिन आश्चर्य इस तस्वीर को देखने के बाद होगा. जहां जानवर भी उसी पानी से अपनी प्यास बुझाते नजर आते हैं. ऐसे में जानवरों के साथ यदि इंसान भी एक ही घाट के पानी से अपनी प्यास बुझाते नजर आए तो थोड़ा अचरज जरूर होगा.
चतरा जिले के नक्सल प्रभावित सिमरिया प्रखंड अंतर्गत पीरटांड़ गांव की स्थिति इन दिनों यही बया कर रही है. अनुसूचित जनजाति बहुल इस गांव के लोग जल संकट की समस्या से जूझ रहे हैं. स्थिति यह है कि यहां के लोग प्रशासनिक उपेक्षा के कारण जंगल से निकलने वाले नदी व नाले के दूषित पानी पीने को मजबूर है.
यहां न तो कुआं हैं और ना ही चापानल. ग्रामीणों के अनुसार गांव में दिखावे के लिए एक जनमीनार और एक हैंडपंप है भी तो विगत पांच वर्षों से खराब पड़ा है. बावजूद अबतक किसी भी सरकारी रहनुमाओं की नजर अबतक इस गांव पर नहीं पड़ी है. जिसके कारण रोजाना गांव के पास वाले नदी से निकलने वाले नाले का गंदा पानी ले जाने को ले यहां के ग्रामीण विवस हैं. इसी घाट पर ग्रामीणों के साथ जानवर भी अपनी प्यास बुझा रहे हैं.
वहीं पंचायत के मुखिया एवं जनप्रतिनिधि भी इस समस्या से निजात दिलाने के लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं। इस गांव की हालत देखने के बाद जब ईटीवी भारत की टीम ने पंचायत के मुखिया मुकता पांडेय से कारण पूछा तो उन्होंने पहले तो जानकारी नहीं होने की बात कही उसके बाद गांव में पेयजल की व्यवस्था 24 घंटे के भीतर करने की बात कही।

