जगदम्बा प्रसाद शुक्ल,
प्रयागराज: वैश्विक महामारी के चलते पिछले तीन महीने से घरों में बैठे लोगों का धैर्य अब जबाब दें रहा है और लोग मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं. पिछले 22 मार्च से देश मे कोरोना बीमारी के कारण सारी सेवाएं बंद कर दी गई. पहले लॉक डाउन तक तो दूसरे राज्यों में काम करने वाले लोगों ने धैर्य का परिचय दिया लेकिन जब लॉक डाउन आगे बढ़ा दिया गया तो प्रवासियों को अपने घर पहुंचने की जल्दी होने लगी.
आर्थिक तंगी या बीमारी के भय से लोग पैदल, साइकिल, बाइक या अन्य साधनों से लॉक डाउन के नियमों को तोड़ते हुए अपने घर पहुंचने लगे. धीरे धीरे सभी प्रवासी अपने परिवार के बीच आ गए. कुछ समय तक तो सब ठीक रहा लेकिन घर मे बैठे-बैठे उन्हें भविष्य की चिंता सताने लगी. महामारी के लगातार बढ़ते प्रकोप से वे पुनः अपने काम पर जाने से भी डर रहे हैं जिससे उन्हें मानसिक अवसाद झेलना पड़ रहा है.
आर्थिक तंगी भी है प्रमुख कारण
क्षेत्र के अधिकतर लोग अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए मुंबई, दिल्ली, सूरत जैसे महानगरों में प्राइवेट नौकरियां कर रहे हैं. वे किसी कंपनी में नौकरी करके, ऑटो रिक्शा चलाकर, फेरी करके, ठेला लगाकर या वाचमैन का काम करके अपने परिवार का पेट पाल रहे थे. काम बंद होने के कारण अब धीरे धीरे उनकी पूंजी समाप्त होने लगी है. ऐसी स्थिति में उन्हें रोजमर्रा की वस्तुओं की पूर्ति करने में समस्या आ रही है और वे मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं.
हाथ में काम न होना भी है कारण
प्रवासी मजदूरों सहित विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के मन मे सबसे बड़ी चिंता उन्हें दुबारा काम मिलने की है. अभी तो उनके सामने काम पर लौटने की अनिश्चितता है लेकिन वे दुबारा काम पाएंगे या नहीं यह सबसे बड़ी चुनौती है. प्राइवेट संस्थाओं में काम कर रहे कई लोगों ने बताया कि यहां से लौटने के बाद कंपनियां उन्हें काम पर रखेंगी कि नहीं. कुछ लोगों का वेतन भी रुका है. कार्य बंद होने के बाद वे घर पहुंचने की जल्दी में अपना वेतन नही ले पाए. दुबारा जाने पर उनका वेतन मिलेगा या नौकरी से हटा दिया जाएगा जैसे अनेक कारण हैं जिसका तनाव लोगों को झेलना पड़ रहा है.

