रांची: रांची-नेटरहाट मुख्य मार्ग पर गुमला जिले के घाघरा प्रखंड मुख्यालय के निकट पहाड़ियों और जंगल के बीच बसे इस छोटे से गांव को खेती-किसानी में जुटे शिवशंकर भगत ने एग्रो टूरिस्ट प्लेस के रूप में विकसित करने की योजना बनायी है और दिशा में इन्होंने कदम भी बढ़ाना शुरू कर दिया है.
राजधानी रांची से करीब 100किमी दूर बनने वाले यह एग्रो टूरिस्ट प्लेस न सिर्फ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा, बल्कि विभिन्न तरह के फसलों, डेयरी, मत्स्य पालन, बत्तख, मुर्गी पालन और कृषि से जुड़े अन्य कार्यों के लिए स्कूल-कॉलेजों के लिए प्रशिक्षण का केंद्र बनकर उभरेगा.
खेती-किसानी के प्रति समर्पित शिवशंकर भगत का कहना है कि शहरों में रहने वाले बच्चे और युवा पीढ़ी आज कृषि कार्य से पूरी तरह दूर हो गये है. नयी पीढ़ी को यह जरूर मालूम है कि अन्न, सब्जी, फल, दूध, मछली अन्य खाद्य सामग्रियों के बिना जीवन की परिकल्पना अधूरी है, परंतु फसल, साग-सब्जी उगाने या दूध-मछली के उत्पादन में किन कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, इसकी समझ का अभाव है.
यही कारण है कि झारखंड जैसे राज्यों की करीब 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है, लेकिन किस तरह से बेहतर खेती की जाए, कैसे मुनाफा उत्पन्न किया जाए, खेती में नुकसान क्यों हो जाता है, इस बात की जानकारी सही तरीके से लोगों को नहीं मिल पाता है और लोगों का कृषि कार्य से मोहभंग हो जाता है. लेकिन कृषि कार्य में नुकसान होने का प्रमुख कारण किसानों के पास जानकारी का अभाव है. ज्यादातर बीज और खाद बेचने वाली कंपनियां किसानों से सिर्फ पैसे ऐठने में लगी रहती है और उनके खाद-बीज से खेत को किस तरह से नुकसान हो जाता है, इस बात की जानकारी किसानों को काफी देर से मिल पाती है.
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर उन्होंने एग्रो टूरिस्ट प्लेस बनाने का निर्णय लिया है. शिवकुमार भगत रांची और आसपास के सभी छोटे-बड़े स्कूल प्रबंधन से मिलकर आग्रह करेंगे कि वे अपने बच्चों को फसल, साग-सब्जी, फल, दूध, मछली उत्पादन के लिए 7-8 दिनों तक उनके फॉर्म हाउस में प्रशिक्षण के लिए जरूर भेजे. एग्रो टूरिस्ट प्लेस में उन्होंने आधुनिक कृषि उपकरण के अलावा सदियों से प्रयोग में आ रहे परंपरागत कृषि औजार का एक छोटा सा संग्रहालय भी बनाने का निर्णय लिया है.
इसके अलावा पर्यटकों और स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं के रहने-खाने पीने के लिए समुचित व्यवस्था तथा परिवहन सुविधा भी उपलब्ध कराने की योजना बनायी है. इस काम में उन्होंने सरकार से भी कुछ सहयोग की भी अपेक्षा जतायी है.
घाघरा में अपने सैकड़ों एकड़ के फॉर्म हाउस में केला, पपीता, स्ट्रोबरी, आम, अमरूद, अनार, विभिन्न प्रकार की सब्जियां, डेयरी, मत्स्य पालन और मुर्गी पालन कर रहे शिवशंकर भगत ने अपनी मेहनत से कुछ ही वर्षां में न सिर्फ एक सफल किसान की पहचान बनायी, बल्कि आसपास के दर्जनों लोगों को रोजगार भी प्रदान किया.
गुमला ही नहीं, बल्कि झारखंड में केला और पपीता की खेती में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके शिवशंकर भगत का कहना है कि कृषि के माध्यम से ही देश की एक बड़ी आबादी को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है और नक्सल समस्या पर भी अंकुश लगाया जा सकता है.
वर्षों से बड़े पैमाने पर केला, पपीता और अन्य सब्जियों के उत्पादन के माध्यम से एक सफल किसान की पहचान बना चुके शिवकुमार भगत का कहना है फसल और उपज तैयार हो जाने पर अब बाजार की समस्या आड़े नहीं आती है, कई बड़ी कंपनियां और व्यवसायी खुद उनके खेतों में आकर उपज ले जाते हैं.
फल और सब्जी उत्पादन तथा फॉर्म हाउस में कार्यरत मजदूरों को आंध्र-प्रदेश के मैसूर से घाघरा आकर कई वर्षों से प्रशिक्षण दे रहे कृषि वैज्ञानिक लोकेश राव का भी मानना है कि लोग यदि सही तरीके से फसल उत्पदन की तकनीकी और नवीनतम जानकारियां हासिल कर लें, तो निश्चित रूप से पलायन पर अंकुश लग सकेगा और लोगों को अपने गांव में ही रोजगार मिल पाएगा.
चंद वर्षों में ही शिवकुमार भगत ने इलाके कई युवाओं को न सिर्फ रोजगार प्रदान किया है, बल्कि आसपास के कई गांवों के सैकड़ों किसानों ने उनके फॉर्म हाउस में आकर प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्नत खेती कार्य भी प्रारंभ कर दिया है.

