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इस जेल से नहीं भागते कैदी, रहते हैं परिवार के साथ

by bnnbharat.com
February 25, 2020
in समाचार
इस जेल से नहीं भागते कैदी, रहते हैं परिवार के साथ

इस जेल से नहीं भागते कैदी, रहते हैं परिवार के साथ

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सांगलीः स्वतंत्रपुर ओपन कॉलोनी, एक एसा जेल है जहां कैदी अपने परिवारों के साथ रहते हैं, जेल के खेतों में सब्जियां उगाते हैं, दिहाड़ी कमाते हैं और सब्जियों को नजदीकी बाजार में बेचने भी जाते हैं. महाराष्ट्र के सांगली जिले के अंतर्गत आने वाले अटपड़ी में एक ऐसी जेल, जहां से नहीं भागना चाहते हैं कैदी .

यहां न तो दरवाजे हैं, न सुरक्षाबलों की चौकियां ही स्थापित की गई हैं. कटीले तारों या ऊंची दीवारों के जरिए सुरक्षा का कोई घेरा भी नहीं बनाया गया है.  इस बात पर यकीन करना कठिन है कि सजायाफ्ता कैदियों को यहां विशेष घरों में रखा गया है.

यह हकीकत है महाराष्ट्र की एक ऐसी जेल की जहां से कैदी भागना नहीं चाहते क्योंकि यहां उनकी जिंदगी का हिस्सा सलाखों के पीछे नहीं बल्कि एक शानदार कमरे में बीतता है. इन कमरों की फर्श टाइल्स वाली है. वे (कैदी) कहीं भी जा सकते हैं, बस उन्हें इस बात का ख्याल रखना होता है कि शाम को 7 बजे रोल कॉल के वक्त वह परिसर में मौजूद हों.

इतना ही नहीं, वे खास मौकों पर ही जेल यूनिफॉर्म पहनते हैं जैसे कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस. 1937 में स्थापित की गईं ये कॉलोनी जेल और अपराध की भावना को बदलने की दिशा में सबसे पहला प्रयोग था. खास बात तो यह है कि यहां वी शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ (1957) के कई सीन फिल्माए गए थे.

इन 83 वर्षों में जीवनयापन की यह सुविधा 61 एकड़ तक पसर चुकी है. इन कॉलोनियों में सैकड़ों कैदी रहते हैं. इतना ही नहीं, वर्ष 2019 में यहां एक नई विंग भी स्थापित की गई थी. कॉलोनियों के विभिन्न हिस्सों के अंदर कमरों की दीवारों का रंगरोगन भी किया गया है.

इन कॉलोनियों के कमरों में फर्श पर टाइल्स लगे हैं और किचन की भी व्यवस्था है। पिछले वर्ष भीषण बारिश के बाद इन मकानों की हालत जर्जर हो गई थी, जिसके बाद स्वतंत्रपुर की इन कॉलोनियों की फिर से मरम्मत की गई है. कैदी बताते हैं कि किस तरह से दया भाव के साथ जेल सुधार के मूल सिद्धांतों ने दोषियों को शांति और उद्देश्य तलाशने में मदद की है.

रोशन हरिश्चंद्र महिस्कर वर्ष 2002 में 31 वर्ष के थे जब उन्हें हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.  उन्हें नागपुर जेल ले जाया गया था, जहां उनके 30 के दशक का एक बड़ा हिस्सा गुजरा. बाद में हरिश्चंद्र को अच्छे आचरण की वजह से स्वतंत्रपुर में शिफ्ट कर दिया गया. शोरशराबे की जगह आज उनकी जिंदगी शांति से कट रही है.

महिस्कर कहते हैं, ‘मैं 365 दिनों के अच्छे आचरण से 360 दिनों की छूट हासिल करूंगा. इससे मेरी सजा की अवधि कम हो जाएगी.  मुझे भागने की जरूरत ही क्या है, जब मैंने अपनी अधिकांश सजा काट ली है. यदि मैं यह तय करता हूं कि मुझे बाजार से नहीं लौटना है तो उनके पास मेरी पूरी जानकारी है. ऐसे में मुझे फिर से ऊंची दीवारों वाली जेल में लौटना होगा.

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