रांची: आर्थिक मामलों के जानकार सूर्यकांत शुक्ला ने कहा है कि कोरोना संकट काल में जीडीपी ग्रोथ में तेज वृद्धि खर्च बढ़ाने से ही हासिल होगी और बढ़ी ग्रोथ में रोजगार और इनकम बढ़ेगी.
सूर्यकांत शुक्ला ने कहा कि सरकारी खर्चाें पर पाबंदियों को दूसरी तिमाही में भी लागू रखने का वित्त मंत्रालय का फरमान ऐसे समय में आया है, जब देश की जीडीपी वृद्धि दर निगेटिव जोन में जा रही है.
एसबीआई, आरबीआई, वल्र्ड बैंक, आईएफएफ जैसे वित्तीय संसाधन और क्रिसिल, मूडीज, नोमुरा और गोल्डमैन रेटिंग एजेंसियों ने भारत की विकास दर को माइनस यानि ऋणात्मक 3 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच में रखा है.
आरबीआई गनर्वर के अनुसार, उच्च आवृत्ति संकेतक मांग में गिरावट का संकेत दे रहे हैं. सबसे बड़ा झटका तो निजी खपत को लगा है, जिसकी हिस्सेदारी घरेलू मांग में 60 प्रतिशत की होती है.
जब तक अर्थव्यवस्था में निजी खपत खर्च में गिरावट होती है, तो सरकार पब्लिक एक्सपेंडिचर को बढ़ाकर विकास को गति देने की नीति अपनाती है.
परंतु यह पहला मौका है जब सरकारी खर्चाें में पाबंदियों की दूसरी फरमान 25 जून को जारी की गयी है, जबकि पहली फरमान 8 अप्रैल को जारी हुई थी.
उन्होंने कहा कि देशव्यापी कोविड-19 लाॅकडाउन के बीच कर राजस्व में भारी गिरावट के कारण व्यय को प्राथमिकता देने के लिहाज से ऐसे किया जा रहा है.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पाॅलिसी की प्रोफेसर एनआर भानुमति का कहना है कि सरकार उन सेक्टर में ज्यादा खर्च करेगी, जहां रोजगार की ज्यादा संभावना है.
पहली तिमाही के दौरान उच्च शिक्षा, कौशल विकास, हाउंसिंग और पेयजल स्वच्छता के बजटेड खर्च में ज्यादा कटौती हुई, जबकि हेल्थ फार्मासूटिकल्स, खाद्य ग्रामीण विकास जो कोविड-19 की लड़ाई में आगे थे, उनको खर्च की अनुमति दी गयी. डर इस बात का है कि यदि समग्र सरकारी व्यय में गिरावट होती है, तो यह जीडीपी ग्रोथ के लिए घातक कदम होगा.
कोविड वायरस का समय एक अभूतपूर्व संकट का समय है और ऐसे में राजकोषीय घाटा या रेटिंग डाउन ग्रेड से डरना नहीं है, उधारी लेकर कर्ज-जीडीपी रेश्यो को बढ़ाकर सरकारी खर्च के सहारे रोजगार सृजन करने, लोगों की इनकम बढ़ाने का काम यदि किया जाए, तो आने वाले समय में बढ़े ग्रोथ के सहारे से कर्ज रेश्यो को ठीक किया जा सकता है, लेकिन अगर खर्च के डर से खर्च में कटौती करते रहे तो स्लो ग्रोथ के लंबे चक्कर में हमारी अर्थव्यवस्था फंस जाएगी.

