कृषि अनुसंधान के लाभ से किसान रह रहे वंचित
रांची: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान केंद्र अलग झारखंड राज्य गठन के 19 वर्षों के बाद भी क्षेत्रीय कार्यालय के रूप में अब तक उत्कृमित नहीं किया जा सकता है और न ही राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार को इस संबंध में अब तक कोई प्रस्ताव ही भेजा गया है.
कृषि प्रणाली का पहाड़ी एवं पठारी अनुसंधान केंद्र (पूर्व में अनुसंधान केंद्र रांची) रांची की स्थापना 1979 में पूर्वी भारत के पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र में बागवानी और कृषि वानिकी पर अनुसंधान की आवश्यकता की पूर्ति के लिए जनजातीय उप योजना के अंतर्गत की गयी. आगे चलकर 1 अप्रैल 2001 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर पटना में इसके विलय के बाद से यह केंद्र पूर्वी पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र में समन्वित कृषि प्रणाली के विकास के लिए कार्यरत है.
केंद्र सरकार द्वारा पूर्वी पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र के लिए सब्जियों की 55 एवं फलों की 3 उन्नत किस्मों का विकास किया गया है. इसके अतिरिक्त केंद्र द्वारा कृषि की अनेक उन्नत तकनीकें विकसित की गयी है.
जिसमें समेकित सस्य प्रणाली मॉडल, फल आधारित बहुस्तरीय सस्य प्रणाली, उच्च घनत्व एवं अति घनत्व के बाग लगाना, कद्दूवर्गीय फसलों में उप सतही टपकन प्रणाली, संसाधन संरक्षण तकनीक, कंद-मूलों समेत पारंपरिक खाद्य संग्रह, निर्धारण एवं मूल्यांकन, अनुत्पादक, पुरने एवं जीर्ण बागों का उद्धार,वर्षाजल संचयन एवं जल के बहुआयामी उपयोग, वर्ष भर मशरूम उत्पादन, शीघ्र तैयार होने वाले मशरूम सूप मिश्रण, सबिजयों में बीज रंजक, बीज जनित रोगों के नियंत्रण के लिए बीज पर परत चढा, वर्षाश्रिम उच्च भूमि में विविधता, पूर्वी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्र में सूक्ष्म जलसमेट का जलीय प्रभाव, कृषि वानिकी उपायों द्वारा कोयला खान प्रभावों में पुनर्वास, फलों के बगीजों में पौधों की बेसिन का समृद्धिकरण, झारखंड की गौण पत्तेदार सब्जियों में पोषक पदार्थ का निरुपण, कृषि में अक्षय उर्जा स्रोत का प्रचार-प्रासर शामिल है.
केंद्र सरकार द्वारा इस क्षेत्र में कृषि की तकनीकी के प्रसार के लिए वृहत स्तर पर उत्कृष्ट बीज एवं रोपण सामग्री का प्रवर्धन किया जाता है. विकसित उन्नत तकनीकों का किसानों के बीच लोकप्रियरण किया जाता है. पिछले 20 वर्षों में केंद्र द्वारा झारखंड के किसानों को कई प्रभार से लाभ पहुंचाया गया है.
पिछले 20 वर्षों में लगभग 16 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में केंद्र पर उत्पादित उन्नत बीजों की खेती से किसानों को लगभग 280 करोड़ रुपये की आय प्राप्त हुई है. पिछले 20 वर्षों में 3000 हेक्टेयर क्षेत्र में केंद्र द्वारा निर्मित फल-सब्जियों को पौधे की खेती से किसानों को लगभग 180 करोड़ रुपये की आय प्राप्त हुई.
10 वर्षों में लगभग 30 टन मशरुम स्पॉर का उत्पादन किया गया, जिससे किसानों को 75 लाख रुपये की आय मिली. 20 वर्षों में केंद्र पर लगभग 2.30 लाख किसानों का आगमन हुआ, जिन्हें प्रशिक्षण, पौध सामग्री प्रदान कर उनका क्षमता निर्माण किया गया और पिछले 5 वर्षों में केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों के लाभार्थ उनके खेतों पर जाकर दो हजार से अधिक तकनीकी प्रदर्शन किया गया.

