नयी दिल्ली: केन्द्र सरकार ने इन बातों को बेबुनियाद और अनुचित करार दिया है कि कोरोना वायरस’कोविड-19′ संक्रमण के नाम पर जो जानकारी ली जा रही है उसका इस्तेमाल धार्मिक आधार पर “मैपिंग” के लिए किया जा सकता है.
स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता लव अग्रवाल ने सोमवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में एक सवाल के जवाब में कहा कि इस तरह की बातें पूरी तरह आधारहीन हैं और गलत हैं तथा इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने पहले ही स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं कि कोरोना के बारे में कोई भी फेक न्यूज नहीं प्रसारित करें.
इस समय सरकार किसी क्षेत्र में कोई विभाजन नहीं कर रही है और उसका पूरा ध्यान कोरोना महामारी से निपटने में है क्योंकि यह एक ऐसा संक्रामक रोग है जो जाति,धर्म, क्षेत्र और देश की सीमाओं में भेद नहीं कर रहा है.
उन्होंने एक बार फिर स्पष्ट किया कि देश में कोरोना संक्रमण अभी सामुदायिक संक्रमण के स्तर पर नहीं पहुंचा है और कुछ राज्यों में कुछ खास हिस्सों अथवा ‘क्लस्टर’ में कोरोना के मामले अधिक देखे जा रहे हैं और इसे देखते हुए इनसे निपटने की रणनीति अपनाई जा रही है.
पूर्वोत्तर राज्यों में भी संक्रमण के मामले बहुत कम देखने को मिल रहे हैं और इसी के आधार पर देश को रेड, ओरेंज और ग्रीन जोन में बांटकर रणनीति अपनाई जा रही है.
श्री अग्रवाल ने बताया कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद(आईसीएमआर), राष्ट्रीय विषाणु संस्थान(एनआईवी) पुणे ने कोरोना वायरस संक्रमण कोविड -19 के एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए स्वदेशी “आईजीई एलिजा टेस्ट किट -‘काेविड कवच एलिजा’को विकासित करने में सफलता हासिल की है. इसके आधार पर एंटीबॉडी टेस्ट किट बनाने में सफलता मिलेगी.
उन्होने बताया कि इस किट की ‘विशिष्टता’ की दर 97 प्रतिशत है और इसकी ‘संवेदनशीलता’ 92 प्रतिशत है और इसका इस्तेमाल कोरोना के रूख यानि सर्विलांस को जानने में किया जा सकता है. इसके लिए आईसीएमआर-एनआईवी ने व्यावसायिक पैमाने पर किट उत्पादन के लिए मंजूरी दे दी है.
गौरतलब है कि जब किसी व्यक्ति काे कोरोना संक्रमण हाेता है ताे हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इस विषाणु को मार गिराती है और इस सफल अभियान को अंजाम देने वाली कोशिकाओं में कुछ खास तरह के रक्षात्मक प्रोटीन होते हैं जिन्हें एंटीबॉडी कहा जाता है.
जिस व्यक्ति को कोरोना का संक्रमण हुआ है तो उसके शरीर में एंटीबाडी की जांच कर पता लगाया जा सकता है कि उसे कोरोना विषाणु का संक्रमण हुआ था और यह आधार सामुदायिक स्तर पर कोरोना संक्रमण के रूख को दर्शा सकता है.
एंटीबॉडी टेस्ट सिर्फ संक्रमण के बाद की अवस्था में ही सफल माना जाता है जबकि आरटीपीसीआर टेस्ट यह बता सकता है कि संक्रमण हो चुका है क्याेंकि संक्रमण होने के कम से दस दिन बाद शरीर में एंटीबाडी का पता लगता है. एंटीबॉडी टेस्ट को सर्विलांस के लिए प्रयुक्त किया जाता है.

