रांची:- विधायक सरयू राय ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि भारत सरकार की कम्पनियों के खनन पट्टों का अवधि विस्तार करने पर रॉयल्टी के अतिरिक्त रॉयल्टी के एक निश्चित प्रतिशत का भुगतान राज्य सरकार को करने के बारे में भारत सरकार द्वारा 3 दिसंबर 2015 को तैयार की गयी नियमावली Mineral (Mining By Government Company) Rules 2015 के प्रासंगिक प्रावधान (नियम-5) की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ जो निम्नलिखित है :-
5. Payments by a Government company or corporation under sub-section (2C) of section 17A of the Act.–(1) A Government company or corporation or a joint venture, granted a mining lease in accordance with the provisions of subsections (2A) and (2B) of section 17A of the Act, shall pay an amount equivalent to a percentage of the royalty paid in terms of the Second Schedule to the Act, as notified by the Central Government in each case.
(2) A Government company or corporation shall make payments to the State Government as specified under sub-rule (1).
(3) A Government company or corporation shall also pay such other amounts as may be required under any law for the
time being in force to the concerned authorities, including,-
(i) Royalty or dead rent to the State Government;
(ii) Payment to the National Mineral Exploration Trust; and
(iii) Payment to the District Mineral Foundation.
इस नियम के उपनियम 1 A से स्पष्ट है कि भारत सरकार की किसी कम्पनी, निगम या संयुक्त उपक्रम के खनन पट्टों पर रॉयल्टी के साथ ही रॉयल्टी के एक सुनिश्चित प्रतिशत का अतिरिक्त भुगतान अधिशुल्क के रूप में कम्पनी/निगम/संयुक्त उपक्रम द्वारा संबंधित राज्य सरकार को करना होगा.
परंतु झारखंड सरकार की पूर्ववर्ती सरकार ने झारखंड विधानसभा – 2019 चुनाव के दो-एक माह पहले “सेल” की पश्चिम सिंहभूम ज़िला में स्थित कतिपय लौह अयस्क खनन पट्टों का अवधि विस्तार रॉयल्टी पर अतिरिक्त अधिशुल्क वसूले बिना अगले 20 वर्ष के लिये कर दिया.
सवाल है कि विधान सभा चुनाव के ठीक पहले आनन फ़ानन में सेल के लौह अयस्क पट्टों का अवधि विस्तार तत्कालीन सरकार ने किस नीयत से कर दिया ? क्या सरकार के अधिकारियों और खान मंत्री, जो स्वयं मुख्यमंत्री थे, को इस बहुचर्चित नियमावली के इस राजस्व प्रावधान की जानकारी नहीं थी ?
जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो भारत सरकार को सूचित कर इस मामले में अधिसूचना जारी कराने के बदले में सरकार ने सीधे सेल को अतिरिक्त अधिशुल्क की माँग भेज दिया जो नियमानुकूल नहीं था. नतीजा सेल इसके विरूद्ध झारखंड हाईकोर्ट चला गया. हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार की माँग पर स्थगन आदेश दे दिया. पहले नियमों का पालन नहीं करना और बाद में अपनी चमड़ी बचाने के लिये अनियमित कार्रवाई कर देना और फिर न्यायिक प्रक्रिया में अपना दावा ख़ारिज कराना पूर्ववर्ती सरकार की रणनीति रही है, विशेषकर खनन मामलों में.
ऐसी ही स्थिति में कर्नाटक सरकार ने जो कदम उठाया है उसका उल्लेख यहाँ प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है. भारत सरकार के एक उपक्रम एनडीएमसी की डोनिमलाई खान के खनन पट्टा का अवधि विस्तार देने की एवज़ में कर्नाटक सरकार ने रॉयल्टी का 80 प्रतिशत की माँग कर दिया. एनएमडीसी ने देने से इंकार कर दिया. फलस्वरूप डोनीमलाई लौह अयस्क खदान दो वर्ष तक बंद रही. एनडीएम सी ने कर्नाटक सरकार के इस निर्णय को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दिया जहां उसका मुक़दमा ख़ारिज हो गया. इसके बाद भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया. कर्नाटक सरकार और एनएमडीसी के बीच 22.50 प्रतिशत अतिरिक्त अधिशुल्क पर खनन पट्टा अवधि विस्तार करने पर सहमति बनी. कर्नाटक सरकार ने डोनिमलाई लौह अयस्क खनन पट्टा का अवधि विस्तार मात्र 3 वर्ष के लिये किया.
दूसरी ओर झारखंड की पूर्ववर्ती सरकार ने सेल से अतिरिक्त अधिशुल्क लिये बिना उसकी लौह अयस्क खदानों के खनन पट्टों का अवधि विस्तार 20 वर्षों के लिये कर दिया. इस उदारता पर सवाल उठना लाज़िमी है. सेल की जिन खदानों के खनन पट्टा का विस्तार इन्होंने 20 वर्षों के लिये कर दिया है, उनपर 22.50 प्रतिशत की दर से अतिरिक्त अधिशुल्क की गणना करने पर अधिशुल्क की कुल राशि क़रीब 8000 करोड़ रू० तक जा सकती है. इन्होंने भी इनकी उदारता का पर्दाफ़ाश हो जाने के बाद एक अनियमित रणनीति के तहत सेल से 2800 करोड़ रू० (15% रॉयल्टी के समतुल्य) की माँग की थी जो हाईकोर्ट में खारिज हो गई.
वर्तमान सरकार को नये सिरे से सेल और भारत सरकार के समक्ष यह विषय उठाना चाहिये. मेरे दो सुझाव हैं. पहला कि राज्य सरकार झारखंड हाईकोर्ट द्वारा दिये गये स्थगन आदेश के संदर्भ में कोर्ट में एक पूरक शपथ पत्र दायर करे. जहां तक मेरी जानकारी है इस मामले में हाईकोर्ट का स्थगन आदेश केवल अगली तिथि तक के लिये है. पिछली सरकार ने कोर्ट से अगली तिथि तय कराने में रुचि नहीं दिखाया. चुकि यह राज्यहित का मामला है इसलिये वर्तमान सरकार के हाईकोर्ट में मेंशन करा कर अगली तिथि तय कराना चाहिये और कर्नाटक हाईकोर्ट के प्रासंगिक निर्णय के आलोक में रोक हटवाकर सेल द्वारा दायर मुक़दमा निष्पादित कराना चाहिये.
दूसरा, सेल पर दबाव बनाने के लिये विधिसम्मत प्रयास आरम्भ करना चाहिये. सेल की इन खदानों से उत्खनित लौह अयस्क के परिवहन के लिये राज्य सरकार को चालान नही देना चाहिये. सेल ने भारत सरकार के निर्देशानुसार अपनी आधा दर्जन से अधिक लौह अयस्क खदानों का फ़ाइंस बेचने के लिये ई-ऑक्शन निविदा प्रकाशित किया है. इसमें भी अनियमितता है, हुई है और हो रही है. इनका चालान रोककर भी भारत सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है.
आशा है व्यापक राज्यहित में और उपर्युक्त विवरण के आलोक में इस विषय में विधिसम्मत कार्रवाई करना चाहेंगे.

