रांची: तारीख- 16 मार्च 2020 की शाम झारखंड सरकार ने एकाएक डीजीपी केएन चौबे को हटाकर उनकी जगह 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी एमवी राव को प्रभारी डीजीपी बनाया गया.
18 मार्च को एमवी राव ने डीजीपी का पदभार संभाला. जब एमवी राव को प्रभारी डीजीपी बनाया गया, वरीयता में वह पांचवे नंबर पर थे. प्रभारी डीजीपी के तौर पर काम कर रहे राव को डीजीपी बनाने के लिए राज्य सरकार ने 21 जुलाई 2020 को पांच आईपीएस अधिकारियों का पैनल यूपीएससी को भेजा.
लेकिन पैनल में शीर्ष तीन नामों की सूची भेजने के बजाय यूपीएससी ने राज्य सरकार को झटका दे दिया है. यूपीएससी ने पूछा है कि किन परिस्थितियों में केएन चौबे को पद से हटाया गया.
सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए डीजीपी को हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं. तब तक पैनल पर विचार करने से इंकार कर दिया गया है. वहीं इस मामले में अलग से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिसमें प्रभारी डीजीपी के तौर पर एमवी राव की प्रतिनियुक्ति को अवैध बताया गया है.
इस याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट के डबल बेंच में 13 अगस्त को सुनवाई होनी है. ऐसे में सवाल सत्ता के गलियारों के साथ साथ पुलिस महकमे में भी पूछे जा रहे कि क्या डीजीपी के तौर पर एमवी राव की कुर्सी खतरे में है?
6 अगस्त के पत्र में ऐसा क्या, जिसने बढ़ायी चिंता
6 अगस्त को यूपीएससी ने सरकार के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह को पत्र लिखकर पूर्व के डीजीपी केएन चौबे को हटाने की वजह पूछी है. वहीं राज्य सरकार के द्वारा डीजीपी की बहाली के लिए पांच आईपीएस अधिकारियों के नाम के पैनल पर किसी भी तरह की सुनवाई से इंकार कर दिया है.
यूपीएससी ने लिखा है कि केएन चौबे के दो साल का टर्म पूरा नहीं हुआ, ऐसे में उन्हें क्यों हटाया गया. जब तक हटाए जाने की वजह स्पष्ट नहीं होगी, यूपीएससी ने पैनल पर विचार करने से इंकार कर दिया है.
16 मार्च 2020 को अचानक ही केएन चौबे को महज नौ माह के कार्याकाल के बाद हटाकर दिल्ली में आधुनिकीकरण का ओएसडी बना दिया था, वहीं एमवी राव को प्रभारी डीजीपी बना दिया गया था.
यूपीएससी ने लिखा दो साल के भीतर डीजीपी को हटाना गलत
यूपीएससी ने डीजीपी के पैनल लिस्ट के लिए भेजे गए पत्र के बाद राज्य सरकार को जो पत्र भेजा है, उसमें सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरूद्ध बताया गया है.
यूपीएससी ने लिखा है कि 31 मई 2019 को राज्य सरकार ने केएन चौबे का नोटिफिकेशन बतौर डीजीपी निकाला था. यूपीएससी के इंपैनलमेंट कमेटी मीटिंग में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अंतर्गत भेजे गए नामों के आधार यह चयन दो सालों के लिए हुआ था.
यूपीएससी ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि यूपीएससी के द्वारा राज्य के तीन वरीय अफसरों के नाम का पैनल भेजा जाएगा. अफसरों के बेहतर सर्विस रिकॉर्ड, सेवा की अवधि व पुलिस विभाग में अनुभवों के आधार पर इन तीन वरीय अफसरों में एक को राज्य सरकार को डीजीपी के पद पर दो सालों के लिए चुनना होगा.
दो साल के भीतर इन पुलिस अधिकारियों को तब ही हटाया जा सकता है, जब इन्हें ऑल इंडिया सर्विस रूल्स में दोषी पाया गया हो, किसी मामले में न्यायालय के द्वारा सजा दी गई हो या शारीरिक वजहों से वह काम करने में अक्षम हों.
सरकार को बतानी होगी केएन चौबे को हटाने की वजह
यूपीएससी ने राज्य सरकार से केएन चौबे को हटाने की वजह पूछी है. पूछा गया है कि उन्हें किन वजहों से डीजीपी के पद से हटाया गया. क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के दायरे में आने वाली किसी वजह से उन्हें हटाया गया है.
राज्य सरकार को यूपीएससी ने स्पष्ट किया है कि बगैर वजह बताए सरकार के द्वारा नए डीजीपी की प्रतिनियुक्ति संबंधी पैनल भेजने पर विचार नहीं किया जा सकता.



