रांची: अगर बंजर भूमि में सोना उगने लगे, तो कईयों के जीवन में बदलाव की बयार आ जाती है. ऐसा ही कुछ संभव हुआ है पूर्वी सिंहभूम में, जहां युवाओं के समूह द्वारा टाड़ जमीन पर तिल की खेती शुरू की गयी है.
हम सभी जानते हैं की गांव में काफी टाड़ जगह यानी बंजर भूमि रहती है, जिसका लोग उपयोग नहीं करते हैं. पूर्वी सिंहभूम जिला में कोरोना काल में कुछ युवाओं ने झारखंड ट्राईबल डेवलपमेंट सोसाइटी जेटीडीएस के प्रोत्साहन और सहयोग से ऐसी ही बंजर भूमि पर तिल की खेती का प्रयोग किया जो काफी सफल रहा है.
तिल का उपयोग जहां तेल निकालने में होता है, वही मकर संक्रांति में भी इसकी आवश्यकता पड़ती है. बंजर भूमि में तिल की खेती 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती है और इसका मूल्य 200 से 250 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मिलता है. पूर्वी सिंहभूम जिले के पोटका प्रखंड कुंदरू कोचा गांव में 3 एकड़ भूमि में अब तक 7 क्विंटल तिल निकल चुका है और 10 से 12 क्विंटल अभी और निकलेगा.
इस इलाके में टाड़ जगह पर तिल की खेती का फायदा यह हुआ एक ओर जहां इससे बंजर भूमि हरियाली में बदल गई, वहीँ इससे कोरोना काल में स्थानीय लोगों को घर बैठे रोजगार भी मिलने लगा.
लाभार्थी बोंगा टूडू बताती है कि उन्होंने 1 एकड़ में तिल की खेती की तथा उन्हें जेटीडीएस से इस काम में ज़रूरी सहयोग भी मिला है. वहीं गांव के लाभार्थी रोहित सरदार ने 12-13 लोगों के साथ मिलकर बंजर भूमि में तिल की खेती की है जिसका उन्हें काफी लाभ मिल रहा है . उनका कहना है की बंजर भूमि का सदुपयोग करने से हमारे जीवन में काफी बदलाव आया है.
कोरोना काल में बंजर भूमि से तिल उपजाकर इन युवाओं ने बंजर भूमि में सोना उपजने जैसी कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है . इस सफल प्रयोग से ना केवल आत्मनिर्भर भारत की मुहीम को बल मिला है, बल्कि इससे बंजर जमीन के हराभरा होने से पर्यावरण संरक्षण को भी संबल मिला है.

