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राजधानी रांची के बीचों-बीच है नरक, हर सप्ताह बस्ती से उठती है 3 से 4 अर्थियां

by bnnbharat.com
February 2, 2020
in समाचार
राजधानी रांची के बीचों-बीच है नरक, हर सप्ताह बस्ती से उठती है 3 से 4 अर्थियां

राजधानी रांची के बीचों-बीच है नरक, हर सप्ताह बस्ती से उठती है 3 से 4 अर्थियां

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आदित्य,

खास बातें:-

  • हालत ऐसी की वहां इंसान तो क्या, जानवर भी नहीं रह सकते

  • चिरौंदी के वाल्मीकि नगर की है ये कहानी, प्रशासन के नाक के नीचे हो रहा सबकुछ

  • वाल्मीकि अंबेडकर मलिन बस्ती आवास योजना के तहत बनीं 867 इकाइयां पूरी तरह से जर्जर

  • नालियों के बीच रहते हैं सफाईकर्मी, मेडिकल, सफाई कोई बुनियादी सुविधा ही नहीं

रांचीः अगर कहीं नरक है तो यहीं है यहीं है. वह भी राजधानी रांची के बीचों-बीच. राजधानी के बीचों-बीच एक ऐसी बस्ती है जहां हर सप्ताह तीन से चार लाशें निकलती हैं. यह सब प्रशासन के नाक के नीचे हो रहा है. यह बस्ती बसी हुई है राजधानी के चिरैंदी इलाके में. इस इलाके में सरकार ने वाल्मीकि अंबेडकर मलिन बस्ती आवास योजना (वांबे) के तहत 867 मकान बनवाए थे. जिसमें विस्थापित परिवारों को गुजर-बसर की जगह दी गई थी. इस बस्ती में 1000 से अधिक सफाई कर्मी रहते हैं. लेकिन गंदगी ऐसी कि हर कोई गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया है. ईलाज की कोई सुविधा नहीं.

2011 में बसाया गया था वाल्मीकि नगर:

वर्ष 2011 में चिरौंदी में विस्थापित परिवारों के रहने के लिए सरकार द्वारा वाल्मीकि नगर बसाया गया था. हाल यह है कि बस्ती पूरी तरह से नरक बन गई है. जिधर जाएं उधर गंदगी का अंबार. साफ-सफाई की कोई व्यवस्था ही नहीं. मेडिकल सुविधा भी जीरो. जलापूर्ति बंद होने से आस-पास के लगभग 400 घरों के लोग प्रभावित हैं.

डोर टू डोर सेवा अब भी बदहाल:

वाल्मीकि अंबेडकर मलिन बस्ती पर जमा कचर नगर निगम अपने वाहनों से किसी प्रकार उठा ले रहा है, लेकिन डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन की हालत अब भी बदहाल है. अब भी 60 प्रतिशत से अधिक घरों से कूड़ा का उठाव नहीं हो रहा है. नतीजतन लोग मजबूरी में खुले या नाली में कचरा फेंक रहे हैं.

इससे ये बस्ती गन्दा होने के साथ-साथ नालियां भी जाम हो रही हैं. ऐसी हालत है की वहां इंसान तो क्या जानवर भी नहीं रह सकते. वहां के लोग इतने गरीब हैं कि आखिर वो जाएं भी तो जाएं कैसे. कुछ ही लोग होंगे जिनको कोई बीमारी ना हो.

खुद बस्ती के लोग कहते हैं कि गंदगी के कारण महीने में कोई ऐसा दिन नहीं होता जब किसी ना किसी की अर्थी ना उठती होगी. वैसे आपको बता दें कि बस्ती कब्रिस्तान के ऊपर बसाई गयी है.

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