रांची: आज नवरात्र के आठवां दिन है. इसे महाअष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. आज के दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरुप यानि महागौरी देवी की पूजा की जाती हैं. महाअष्टमी के दिन इन्हीं की पूजा का विधान है. मां महागौरी परम कल्याणकारी हैं. ये ममता की मूरत हैं और भक्तों की सभी जरूरतों को पूरा करने वाली हैं. अगर आप आर्थिक कष्ट से परेशान हैं, तो मां महागौरी की पूजा आपके आर्थिक कमी की परेशानी को दूर कर सकती है. इसके अलावा महागौरी से मनचाहे विवाह का वरदान भी मिल सकता है.
क्या है देवी महागौरी के स्वरूप की महिमा?
नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है. देवी का रंग गौर होने के कारण इनका नाम महागौरी पड़ा है. महागौरी की पूजा अर्चना से पूर्व जन्म के पाप नष्ट होते हैं. इसके साथ ही इस जन्म के दुख, दरिद्रता और कष्ट भी मिट जाते हैं.
देवी महागौरी की पूजा अर्चना से कुंडली का कमजोर शुक्र मजबूत होता है. इसलिए शादी विवाह में आई हुई परेशानियों को दूर करने के लिए महागौरी का पूजन किया जाता है. महागौरी की पूजा अर्चना से दांपत्य जीवन सुखद होता है साथ ही पारिवारिक कलह क्लेश खत्म होता हैं.
नवरात्रि के आठवें दिन का महत्व क्या है?
नवरात्रि के आठवें दिन मां से शीघ्र विवाह का वरदान मिल सकता है. साथ ही वैवाहिक जीवन भी सुखमय हो सकता है.
- माना जाता है कि माता सीता ने श्री राम की प्राप्ति के लिए इन्हीं की पूजा की थी.
- विवाह संबंधी तमाम बाधाओं के निवारण में इनकी पूजा अचूक होती है.
- ज्योतिष में इनका संबंध शुक्र नामक ग्रह से माना जाता है.
क्या है मां गौरी की पूजा विधि?
- पीले वस्त्र धारण करके पूजा आरंभ करें.
- मां के समक्ष दीपक जलाएं और उनका ध्यान करें.
- पूजा में मां को श्वेत या पीले फूल अर्पित करें.
- उसके बाद इनके मन्त्रों का जाप करें.
- अगर पूजा मध्य रात्रि में की जाय तो इसके परिणाम ज्यादा शुभ होंगे.
विवाह की बाधा दूर करने के लिए ऐसे करें देवी महागौरी की पूजा अर्चना-
- लकड़ी के पटरे पर स्वच्छ पीला वस्त्र बिछाकर देवी महागौरी की प्रतिमा को स्थापित करें.
- स्वयं भी पीले वस्त्र धारण करके पूरे पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें.
- देवी महागौरी के सामने गाय के घी का दिया जलाएं और उनका ध्यान करें.
- देवी मां को सफेद या पीले फूल दोनों हाथों से अर्पण करें तथा मंत्र का जाप करें.
- प्रसाद के रूप में देवी महागौरी को नारियल अर्पण करें.
- ऐसा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी और कन्याओं को सुयोग्य वर मिलता है.
आठवें दिन की पूजा से कैसे शुक्र को करें मजबूत ?
- मां की उपासना सफेद वस्त्र धारण करके करें.
- मां को सफेद फूल, और सफेद मिठाई अर्पित करें.
- फिर शुक्र के मूल मंत्र “ॐ शुं शुक्राय नमः” का जाप करें.
- शुक्र की समस्याओं के समाप्ति की प्रार्थना करें.
- नवरात्रि के आठवें दिन मां को सफ़ेद फूल अर्पित करें.
- इससे मां की विशेष कृपा प्राप्त होगी.
नवदुर्गा का विशेष प्रसाद
- आज मां को नारियल का भोग लगाएं.
- इसे सर पर से फिरा कर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें.
- आपकी कोई एक खास मनोकामना पूर्ण होगी.
मां गौरी की पूजन विधि-
अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं. देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी प्रत्येक दिन की तरह देवी की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं.
मां गौरी की कथा-
माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं. जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं. इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं.
एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा. महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं.देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”. महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं. देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया. इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया. देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और मांउसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी. इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं.

