राज्यसभा में बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए सांसद महेश पोद्दार ने गिनायी बजट की खूबियां
रांची: राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार ने कहा है कि विकास के संस्कार ही बदलाव की बयार बहा सकते हैंद्य शुक्रवार को बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए पोद्दार ने कहा कि सदी की सबसे बड़ी आपदा के दौरान देश का बजट पेश करना और उस बजट में मौजूदा प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटते हुए भविष्य के लिए उम्मीद पैदा करना, आसान काम नहीं था लेकिन यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की प्रतिबद्धता के कारण संभव हुआ है.
महेश पोद्दार ने कहा कि सरकार की आर्थिक आयोजना में आया ये फर्क संस्कारों की वजह से है. दिल्ली में एक महत्वपूर्ण भवन है, जिस सड़क पर है पहले उसका नाम रेसकोर्स रोड था.रेसकोर्स यानि जहां लोग घोड़ों पर दांव लगाते हैं.अब वह सड़क लोक कल्याण मार्ग के नाम से जानी जाती है.नाम का यह बदलाव दरअसल उस भवन में निवास में रहनेवाली हस्ती के उद्देश्यों और लक्ष्यों में बदलाव का भी सूचक है और वह लक्ष्य प.दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद, अन्त्योदय से प्रेरित है.
बजट में आयकर दरों या अन्य करों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रीय आर्थिक विकास की बढ़ी हुई लागत का वहन आम नागरिक अपनी व्यक्तिगत बचत से नहीं करेंगे. बजट में पीपीपी मोड पर ख़ासा जोर है ताकि विकास प्रक्रिया में खर्च के प्रबंधन और पूंजी जुटाने के काम में निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित की जाय.अब निजी क्षेत्र की उद्यमिता का लाभ भी विकास प्रक्रिया को मिलेगा, रफ़्तार बढ़ेगी. देश को रोजगार चाहिए तो वो नारों से नहीं आएंगी .
हवाई यात्रा सुविधा में जो विस्तार हुआ, एयर इंडिया ने नहीं,निजी क्षेत्र ने कियाद्य लेकिन, हमारे यहां के कुछ लोगों का दिमागी दिवालियापन देखिये – आज भी चाइना के निजी क्षेत्र की प्रशंसा करते हैं, उनकी उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, लेकिन अपने निजी क्षेत्र की उपलब्धियों की बात हो तो कहेंगे – लूट लिया.इस संकीर्ण भावना से हमें बाहर निकलना होगा,वेल्थ क्रियेटर का समाज में सम्मान भी होना चाहिए. एक उद्यमी के नाते मुझे पता है कि कुछ वर्ष पूर्व तक कदम कदम पर इंस्पेक्टर राज,सेल टैक्स, एक्साइज, नोटिसेज और साथ में अपमान, दुर्दशा ये एमएसएमई की हालत थी . जिन्होंने ने कभी व्यापार नहीं किया वो जीएसटी पर ज्ञान दे रहे हैं, ठीक उसी तरह से जिन्होंने गमलों में गोभी तक नहीं उगाया वो कृषि पर ज्ञान दे रहे हैं और करोड़ों में कृषि से अपनी आमदनी दिखाते हैं पर टैक्स नहीं देते.कई पार्टियों के जिम्मेवार नेता सदन में दावा करते है कि अधिकांश डैडम् बंद हो गए, मजदूर बेरोजगार हो गए. लगता है लॉकडाउन ख़त्म हो गया पर उनकी जानकारी अभी लॉकडाउन में ही है. अगर एमएसएमई बंद हो गए तो जीएसटी इतना कहां से आया ये साधारण सूझ -बूझ का प्रश्न हैद्यहमें ब्तवदल ब्चपजंसपेउनहीं चाहिए तो क्रोनि सोशलिज्म भी नहीं चाहिए.

