खास बातें:-
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कई सरकारें आईं और कई गईं पर सभी ने इनकी अनदेखी की
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किसी ने भी इन्हें मुख्यधारा में लाने की राह भी नहीं सुझाई
रांचीः उनके अरमानों की चिताएं जल गईं. अपनों ने साथ छोड़ा. समाज ने ठुकरा दिया. जाएं तो जाएं कहां. आगे का रास्ता भी नहीं सूझ रहा. बच्चों की परवरिश के साथ परिवार की गाड़ी खींचना, इतनी मजबूरियां एक साथ झेलना, हर किसी के वश की बात नहीं.
दो जून की रोटी पर भी आफत. कोई भी शख्स उस ओर देखने की भी हिमाकत नहीं करता. इस नजरअंदाज दुनिया में अपने बच्चों के साथ परिवार को तराशना काफी मुश्किल भरा सफर हो जाता है. बस यूं कहें कि दिल के अरमां आंसुओं में बह गए… हम बात कर रहे हैं उन सेक्स वर्करों की जो इस कोरोना काल में गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर हैं. उनकी आंसुओं को पोंछने वाला भी कोई नहीं.
बेबसी के कारण दलदल पर रखा कदम-
जिंदगी में आई बेबशी के कारण दलदल में कदम रखा. यह कदम इसलिए रखा कि परिवार की गाड़ी को खींच सकें. लेकिन इनकी मजबूरियों को किसी ने भी समझने की कोशिश नहीं की.
भावनाओं को नहीं समझा, किसी ने यह पूछने की हिमाकत नहीं की, क्यों इस पेशे में कूद पड़े. बस अपनी प्यास बुझाई और चलते बने. इस पेशे से जुड़े लोग बताती भी हैं कि आज तक कोई भी ऐसा नहीं मिला जो यह कहे कि, चलिए मुख्यधारा में लौटिए. नई जिंदगी की शुरूआत कीजिए. यह भी समझाने की कोशिश नहीं किया कि आगे की भी जिंदगी पड़ी है, जिसे संवारा जा सकता है.
एक मां भूख से तड़पते बच्चे को नहीं देख सकती-
इस पेशे से जुड़े लोग कहती भी हैं कि एक मां अपने बच्चे को भूख से तड़पड़ता नहीं देख सकती. बच्चों की परवरिश के लिए निवाला भी चाहिए. ऐसी स्थिति तब हो जाती है जब उनके घर वाले साथ छोड़ देते हैं. कोई रास्ता नहीं सूझता. पति का साया भी सिर से उठ जाता है.
कोई मदद को तैयार नहीं रहता. ऐसे में बस अपनी जिस्म बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखता. दूसरा पहलू ये भी है कि कुछ महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार भी हो जाती है. पति शराबी निकल जाता है.
हर दिन घर में खिच-खिच मारपीट की घटना. इस जलालत भरी जिंदगी से निकलने की कोशिश में वे दलदल में फंस जाती हैं. अशिक्षा भी इस दलदल की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभा रही है.

