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ऐसे हुई शंख की उत्‍पत्ति

by bnnbharat.com
September 19, 2020
in समाचार
ऐसे हुई शंख की उत्‍पत्ति
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रांची: शास्त्रों में शंख को बड़ा ही कल्याणकारी बताया गया हैं. पूजा-पाठ में शंख बजाने का चलन युगों-युगों से चला आ रहा है. देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियमित रूप से बजाते हैं. ऐसा माना जाता है कि शंख मां लक्ष्मी का भाई है. शंख को समुद्र मंथन से निकले रत्नों में से एक माना जाता है.

कैसे हुई शंख की उत्पत्ति?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार शंख भी लक्ष्मी जी की तरह सागर से ही उत्पन्न हुआ है इसी वजह से शंख को लक्ष्मी का भाई बताया गया है. शंख की गिनती समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में होती है. शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं

पूजा में शंख बजाने के फायदे

पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण पवित्र होता है. जहां तक इसकी आवाज जाती है, इसे सुनकर मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छिड़कने से वातावरण शुद्ध होता है. शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है. पुराणों के जिक्र मिलता है कि अगर श्वास का रोगी नियमि‍त तौर पर शंख बजाए, तो वो बीमारी से मुक्त हो सकता है. इससे वाणी दोष भी समाप्त होता है. शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां मजबूत होती हैं. वास्तुशास्त्र के मुताबिक शंख में ऐसे कई गुण होते हैं, जिससे घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है.

शंख के प्रकार

शंख की आकृति के आधार पर सामन्यतः इसके तीन प्रकार माने जाते हैं, दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख. भगवान् विष्णु का शंख दक्षिणावर्ती है और लक्ष्मी जी का वामावर्ती. वामावर्ती शंख अगर घर में स्थापित हो तो धन का बिलकुल अभाव नहीं होता. इसके अलावा महालक्ष्मी शंख, मोती शंख और गणेश शंख भी पाया जाता है.

भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी. पाञ्चजन्य बहुत ही दुर्लभ शंख है. कहते हैं कि महाभारत युद्ध में अपनी ध्वनि से पांडव सेना में उत्साह का संचार करने वाले इस शंख की ध्वनि से संपूर्ण युद्ध भूमि में शत्रु सेना में भय व्याप्त हो जाता था.

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