गीतेश अग्निहोत्री,
कानपुर: शिवली क्षेत्र के पांडव नदी के समीप स्थित प्राचीन जागेश्वर मंदिर. इसी मंदिर के शिवलिंग की वजह से कस्बे का नाम शिवली पड़ा है. इसी मंदिर में विराजमान है अवढर दानी भोलेबाबा शिवलिंग जिसके बारे में मान्यता है की वह स्वयं धरती से प्रकट हुए है. शिवलिंग का दूसरा छोर पाताल से जुड़ा है. बताते चले की प्राचीन समय में बंजारों की एक गाय टीले पर एक जगह दूध गिराने लगती थी. चरवाहों को शंका होने पर उन लोगो ने यहां खुदाई करवाई तो शिवलिंग पाया गया.
18वीं शताब्दी में शिव जी के परमभक्त देवनाथ दुबे ने मंदिर और तालाब का निर्माण करवाया था. अब यहां पर कई देवी देवताओं के मंदिर स्थापित हो चुके हैं. मंदिर के बारे में मान्यता है की यह भोले बाबा का सच्चा दरबार है. यहां श्रद्धालुओं का हुजूम लगा रहता है.
यहां के भक्तों का मानना है की जो बाबा भोलेनाथ से सच्चे दिल से मन्नत मागता है बाबा उसे पूरा करते है. सावन में हजारों की संख्या में दूर दराज के क्षेत्रों से यंहा महादेव के दर्शनों को श्रद्धालु पहुंचते है. मान्यता है कि जागेश्वर मन्दिर के शिवलिंग का दूसरा छोर पाताल से जुड़ा है शिवलिंग के अभिषेक से सुख सम्रद्धि की प्राप्ति होती है.
मंदिर के पुजारी राकेश ने बताया मन्दिर में प्रतिवर्षो की भांति इस बार भी रक्षाबंधन के दिन व बाबा भोले का श्रंगार होता है. शिवली के उत्तर में पांडु नदी के किनारे स्थित है जागेश्वर मंदिर. स्टेट हाइवे 68 चौबेपुर विधूना मार्ग पर उत्तर दिशा की ओर चलकर मन्दिर तक पहुंचा जा सकता है. मन्दिर के दो सौ मीटर दूरी पर शिवली कोतवाली भी बनी हैं
शिवली क्षेत्र के जागेश्वर मन्दिर के अलावा भी कई मंदिर हैं साकेत धाम, महाकालेश्वर, नर्मदेश्वर, शोभन मन्दिर, योगेश्वर मन्दिर, ओकारेश्वर पंचमुखी, रामेश्वर मन्दिर.

