सुरुर रज़ा,
रांची: बाबू हम जैसे तैसे भीख मांगकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे थे. इस कोरोना महामारी ने तो हमारा जीना मुहाल कर दिया है. अब तो भीख भी नहीं मिलता है. सरकार भी ना जाने क्यों हमें बेहाल छोड़ दिया है.
जो खाना देने वाले लोग हैं, वह भी नहीं आते हैं, अब तो भगवान ही एकमात्र सहारा है, हमारी आंखें भी नहीं है कि कोई काम करें. एक भीख ही हमारा अंतिम सहारा है. वह भी छिन गया.

अपनी पीड़ा कहते-कहते बालेश्वर उरांव की आंखें नम हो गई. उनकी नजरों के सामने उनका परिवार दिख रहा है, जो बेहाल है. उनकी इस पीड़ा को बीएनएन भारत ने लोगों के सामने लाने का प्रयास कर रहा है.
बीएनएन भारत के संवाददाता सुरूर रज़ा जब इनकी स्थिति का जायजा लेने इन नेत्रहीनों के घर पहुंचे तो, वहां का नजारा कुछ ऐसा था- वह सारे लोग मायूस बैठे अपनी किस्मत को कोस रहे थे. भगवान से विनती भी कर रहे थे कि यह सब जल्द खत्म हो जाए, ताकि मेरी परिवार को रोटी का एक निवाला तो मिल सके.
कोई आता भी नहीं-
बात करने पर पता चला कि उनकी सुध लेने यहां कोई नहीं आता. जबकि राजधानी में पूरी सरकार बैठती है. यहां सांसद और विधायकों के अलावा सरकार में काबिज मंत्रियों की टीम रहती है. इसके बावजूद इनकी हालत खराब है.
शौचालय भी नहीं-
यह विडंबना नहीं तो और क्या है राजधानी में पूरी सरकार रहने के बावजूद उनके लिए एक अलग शौचालय तक नहीं है. दिन तो जैसे-तैसे चल जाता है, लेकिन रात में उन्हें काफी परेशानि होती हैं.
खासकर औरतों को कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. सरकार भी नहीं सुन रही है. कई बार उन लोगों ने गुहार लगाई पर उनकी सुनने वाला कोई नहीं. अब वह थक चुके हैं.
क्या कहते हैं लोग-
बालेश्वर उरांव कहते हैं कि हमारा परिवार भीख पर ही आश्रित है. लोग जो खाना देते हैं उसी से अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं. इस महामारी के कारण तो लोग खाना देने के लिए भी नहीं आते हैं.
बिरसा कहते हैं कि कभी-कभी लोग आते हैं और चावल दाल दे जाते हैं. उसी से गुजारा चल जाता है पर सरकार से अब तक कोई मदद नहीं मिली.
परिस्थिति यह हो गई है कि परिवार की जीविका चलाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं. सरकार हमें रोटी कपड़ा और मकान की व्यवस्था कर दिया तो भगवान उन्हें आशीर्वाद देंगे.


