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राजनीतिक दलों-नौकरशाहों की बेरुखी से जनता में लोकप्रिय नहीं हो सका ‘सूचना का अधिकार’

by bnnbharat.com
October 12, 2020
in समाचार
राजनीतिक दलों-नौकरशाहों की बेरुखी से जनता में लोकप्रिय नहीं हो सका ‘सूचना का अधिकार’
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शंभू नाथ गौतम (वरिष्ठ पत्रकार),

रांची: आज हम एक ऐसे कानून के बारे में बात करेंगे जो जनता के लिए ही बना था, लेकिन जनता ने ही इसे गंभीरता से नहीं लिया. ‘देश में इस कानून को लागू हुए डेढ़ दशक पूरे हो गए हैं उसके बावजूद यह जन-जन में लोकप्रिय नहीं हो पाया है, छह वर्षों से अधिक केंद्र की सत्ता पर विराजमान मोदी सरकार भी इस एक्ट को बढ़ाने के बजाय कमजोर करने में लगी रही’.

आज 12 अक्टूबर है.  इस तारीख को ‘हम सूचना अधिकार दिवस यानी राइट टू इनफॉरमेशन’ के रूप में याद करते हैं. हम आपको बता दें कि ‘सूचना का अधिकार का तात्पर्य है, सूचना पाने का अधिकार, जो सूचना अधिकार कानून लागू करने वाला राष्ट्र अपने नागरिकों को प्रदान करता है’.

सूचना का अधिकार अधिनियम बने 15 वर्ष पूरे हो चुके हैं. केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने 12 अक्टूबर वर्ष 2005 को देश में सूचनाओं का अधिकार लोगों को दिया. लगभग दो दशक पहले जब देश में सूचना अधिकार कानून बनाने को लेकर राजनीतिक दलों और सरकारों ने खूब शोर मचाया था, लेकिन जब यह कानून देश में लागू हो गया तब सरकारों ने इसके प्रचार प्रसार में कोई रुचि नहीं दिखाई.

‘सूचना के अधिकार को लेकर नेताओं के द्वारा बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती है, लेकिन जब मौका आता है तब वे ही पीछे हट जाते हैं’, दूसरी ओर नौकरशाह भी इस कानून के प्रति अपना माइंडसेट तैयार नहीं कर पाए हैं’. जनता भी इस कानून को आगे बढ़ाने में कम जिम्मेदार नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि लोगों की उदासीनता और जागरूक का न होना. जबकि ‘इस कानून की इतनी ताकत है कि लोग बड़ी से बड़ी सूचनाओं की तह तक पहुंच सकते हैं’.

बता दें कि जिन लोगों ने इस कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया तो कई गड़बड़ियां और भ्रष्टाचार का भी खुलासा करने में सफल हुए. उसके बावजूद भी महत्वपूर्ण अधिकार को लेकर लोग पूरी तरह से जागरूक नहीं हो सके. उल्लेखनीय है कि दुनिया के प्रमुख 123 देशों में आरटीआई कानून है, भारत में इस कानून को जहां सूचना का अधिकार नाम से जानते हैं. वहीं दुनिया के कई देशों में इसे ‘राइट टू नो’ के रूप में जानते हैं.

भारत में आरटीआई कानून के कमजोर होने के लिए रहे ये मुख्य कारण

हमारे देश में आरटीआई कानून जन-जन में लोकप्रिय न हो पाने के कई कारण हैं. ’15 साल बाद भी कुर्सियों पर विराजमान नौकरशाह अभी तक इस कानून के प्रति पर्दा डालने में लगे रहते हैं’. जब यह कानून देश में लागू हुआ था तब आरटीआई कार्यकर्ताओं ने अच्छा खासा माहौल बनाया था लेकिन बाद में वे भी इस कानून को लोगों में फैलाने में अधिक कामयाब नहीं हो सके.

‘केंद्र की मोदी सरकार में भी सूचना अधिकार एक्ट कमजोर साबित हुआ राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के चलते आरटीआई एक्ट का ठीक से पालन नहीं हो रहा है’. सूचना आयोग को मजबूत बनाने में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, राज्य सूचना आयोगों में जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और मानव संसाधन की कमी, सूचना आयोगों में उच्च संख्या में लंबित केस और खाली पदों की संख्या, आरटीआई अर्जियों पर कार्रवाई की समीक्षा तंत्र का अभाव, अप्रभावी रिकॉर्ड मैनेजमेंट सिस्टम आदि रहे हैं जिसकी वजह से यह कानून कमजोर साबित हो रहा है.

देशभर में सूचना आयोगों को सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने नहीं की कोई पहल-

बता दें कि सूचना का अधिकार कानून के तहत सूचना आयोग सूचना पाने संबंधी मामलों के लिए सबसे बड़ा और आखिरी संस्थान है, हालांकि सूचना आयोग के फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. सबसे पहले आवेदक सरकारी विभाग के लोक सूचना अधिकारी के पास आवेदन करता है.

अगर 30 दिनों में वहां से जवाब नहीं मिलता है तो  वह प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास अपना आवेदन भेजता है. अगर यहां से भी 45 दिनों के भीतर जवाब नहीं मिलता है तो आवेदक केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना के आयोग की शरण लेता है.

‘देश भर के सूचना आयोग की हालात बेहद खराब है’. स्थिति ये है कि अगर आज के दिन सूचना आयोग में अपील डाली जाती है तो कई सालों बाद सुनवाई का नंबर आता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि इन आयोगों में कई पद खाली पड़े हैं .

‘मोदी सरकार ने भी सूचना आयोग की ओर सुधारने की कोई खास पहल नहीं की’ . सूचना आयोग के सामने जो 90 फीसदी मामले आते हैं, उनमें सरकार से ही सूचना लेकर लोगों को दिया जाता है. लेकिन अगर उसी सरकार को आयुक्तों की सेवा शर्तें तय करने का अधिकार दे दिया गया है तो जाहिर है कि इस कानून में कमजोरी आ गई .

इस कानून को मजबूत बनाने में दलों के साथ अफसरशाही को अपनानी होगी उदारवादी सोच-

सूचना का अधिकार भारत में जन-जन की कैसे बने आवाज, इसके लिए राजनीतिक दल केंद्र और राज्य सरकारों के साथ अफसरों को भी पहल करनी होगी. केंद्र सरकार को इस कानून मे संशोधन करके आसान प्रक्रिया अपनानी होगी. ‘आमतौर पर देखा गया है कि जनता की सोच आरटीआई कानून को अपना हथियार नहीं मानने की रही है. लोग इसे झंझट समझ कर इस कानून से दूर ही भागते हैं’.

वैसे जनता की सोच को भी हम जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं, क्योंकि देश के सिस्टम और जिम्मेदारों को इस कानून के प्रति उदारवादी रवैया का न होना रहा है . आपको बताते हैं इस एक्ट को कैसे मजबूत बनाया जा सकता है.

आरटीआई एक्ट को प्रभावी बनाने के लिए तकनीक की मदद ली जाए, ऐप से ही ऑनलाइन आवेदन की सुविधा दी जाए, सभी जिम्मेदारों को एक्ट के पालन से जुड़ी विधिवत ट्रेनिंग मिले.

आरटीआई एक्ट को लेकर व्यापक जागरूकता फैलाई जाए, उन सभी सार्वजनिक संस्थाओं को आरटीआई के दायरे में लाया जाए, जिन्हें सरकार से धनराशि मिलती है. गोपनीय आवेदनों पर भी कार्रवाई हो अधिक से अधिक आंकड़ों का खुलासा हो.

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