रंजीत कुमार,
रांची: वर्तमान मोदी सरकार ने घोषणा की वह 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए प्रतिबद्ध है. साथ ही कृषि क्षेत्र में बुनियादी ढांचा को दुरुस्त करने के लिए भी एक लाख करोड़ का प्रावधान किया है. न्यूनतम समर्थन मूल्य भी लागत से 50 फीसदी या उससे भी अधिक तय किया गया है. झारखंड सरकार ने धान खरीद का लक्ष्य 30 लाख क्विंटल था, 15 मई तक 37 लाख 97 हजार क्विंटल धान की खरीद हो चुकी है. इन बातों से ऐसा लगता है कि देश- राज्य के किसान खुशहाल हैं और उसका भविष्य उज्ज्वल है, फिर भी देश में 31 किसान प्रतिदिन आत्महत्या करने को मजबूर हैं. पिछले 10 वर्षों में 10,000 से अधिक किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी.
न्यूनतम समर्थन मूल्य की जटिलताएं
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सोच थी कि किसानों को उत्पाद पर नुकसान उठाना नहीं पड़े और उन्हें कुछ लाभ हो. इसके लिए सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया जाता है. अब जबकि फसलों की लागत मूल्य निकाल कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर दिया गया है. उसके बाद डीजल के दाम में लगातार वृद्धि से किसानों की वास्तविक लागत बढ़ जाएगी, क्योंकि किसान को फसल उत्पादन की प्रक्रिया में डीजल की आवश्यकता होती है.
न्यूनतम समर्थन मूल्य में फसल बेचने के बाद सरकार की ओर से भुगतान में काफी अधिक समय लगता है. गरीब किसान भुगतान के लिए ज्यादा इंतजार नहीं कर सकता. इसलिए उसे कम दाम में फसल को बिचौलियों को बेचना पड़ता है. इस तरह उसे सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य भी नहीं मिल पाती.
किसानों पर साहूकारों का कर्ज
सरकार किसानों को कम ब्याज पर लोन देने की घोषणा तो करती है, लेकिन बैंकों से ऋण देने की प्रक्रिया काफी जटिल है. इसके कारण उन्हें ऊंची दरों पर साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता है. किसी प्राकृतिक आपदा के कारण जब फसल खराब हो जाती है और सरकार द्वारा ऋण माफ किया जाता है तब बैंकों से ऋण लेने वाले किसान को लाभ मिलता है. जिन किसानों ने साहूकारों से ऋण लिया है, उनके सामने आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. किसानों की इस समस्या की ओर किसी भी सरकार ने अभी तक ध्यान नहीं दिया है.
कीटनाशक और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से किसानों को नुकसान
कीटनाशक और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने हमारे खेतों को जहरीला बना दिया है. इससे किसानों को तात्कालिक लाभ तो हुआ, लेकिन धीरे- धीरे इसके दुष्प्रभाव सामने आए, खेतों की उत्पादक क्षमता घटने लगी है. इसलिए सरकार को ऑर्गेनिक खेती पद्धति को बढ़ावा देना चाहिए.
सरकार किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझ कर उसका समाधान करें, नहीं तो हम अपने अन्नदाताओं का जीवन नहीं सुधार सकेंगे. संभव है सरकारी आंकड़ो में किसानों की आय दोगुनी हो भी जाए, लेकिन जमीन पर इसे उतारना किसी चुनौती से कम नहीं है.

