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प्रकृति पर्व सरहुल पर परंपरागत रीति-रिवाज से पूजा अर्चना,करीब 53 साल के इतिहास में दूसरी बार सरहुल की शोभायात्रा नहीं निकाली गई

by bnnbharat.com
April 15, 2021
in समाचार
आज शाम जल रखाई, गुरुवार को टहरी वितरण व सरहुल पूजा; सरना स्थल पर गाइडलाइन के अनुसार होंगे कार्यक्रम
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रांची : प्रकृति पर्व सरहुल आज राज्य भर में उत्साह के माहौल में  मनाया जा रहा है. हालांकि कोरोना संक्रमण के मद्देनजर इस बार सरहुल पर्व काफी सादगी पूर्ण मनाया जा रहा है. यह पर्व प्रकृति के प्रति प्रेम, शांति, हरियाली ,खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है. माना जाता है कि देश के साथ विदेशों में रहने वाले लाखों-करोड़ों आदिवासी समुदाय के लोग भी सरहुल पर्व मनाते हैं. झारखंड में इसे बसंत उत्सव के रूप में कई दिनों तक मनाया जाता है. सरहुल महोत्सव चैत महीने के तीसरे दिन चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है.  यह नए साल की शुरुआत का प्रतीक है. इसमें साल पेड़ और प्राकृतिक तत्वों की पूजा होती है. इसे साल और सखुआ भी कहते हैं. सरहुल में मुख्य रूप से प्रकृति की पूजा होती है. इसमें साल के नए फूल से पूजन किया जाता है. सरहुल पर्व को मुंडा और खड़िया जनजाति के लोग बा, संथाल जनजाति के लोग बाहा कहते हैं. मान्यता है कि साल का फूल सभी फूलों में श्रेष्ठ है और यह प्रकृति का भी प्रतीक होता है.

कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के लिए करीब 53 साल के इतिहास में दूसरी बार सरहुल की शोभायात्रा नहीं निकाली गई. इसको लेकर सभी सरना एवं आदिवासी संगठन निर्णय ले चुके थे. सरहुल के पूर्व संध्या पर भी बुधवार को कहीं पर भी कोई सामूहिक कार्यक्रम नहीं हुआ और न ही कहीं पर सामूहिक नृत्य एवं संगीत का आयोजन किया गया.

साल व सखुआ वृक्ष की विशेष तौर पर की जाती है पूजा

आदिवासियों की प्रकृति प्रेम के प्रतीक के रूप में सरहुल पर्व पूरे राज्य में मनाया जाता है. यह आदिवासी समुदाय का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है. चूंकि यह पर्व रबी की फसल कटने के साथ ही आरंभ होता है. इसलिए इसे नए वर्ष के आगमन के रूप में भी मनाया जाता है. इस पर्व में साल व सखुआ वृक्ष की विशेष तौर पर पूजा की जाती है. साथ ही यह भविष्वाणी की जाती है कि इस साल बारिश की स्थिति कैसी रहेगी.

पाहन ने चार मुर्गे-मुर्गी की दी बलि

पाहन ने चार मुर्गे-मुर्गी की बलि दी और अपने इष्ट देवी देवता सिंहबोंगा एवं जय धर्मेश से कोरोना वायरस से मुक्ति के लिए अराधना की. पाहन ने बताया कि सफेद मुर्गे की बलि सिंहबोंगा को दी गई. यह बलि सृष्टि की रक्षा के लिए दी गई. ग्राम देवता को खुश करने के लिए रंगुआ मुर्गी की बलि दी गई ताकि गांव-घर में शांति व्यवस्था बनी रहे. सुख समृद्धि आए. देश-देवशली की रक्षा के लिए माला मुर्गे की बलि दी गई. पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए लुपूंग मुर्गे की बलि दी गई. जबकि गांव-घर एवं झारखंड में अनिष्ट प्राणियों से रक्षा, भूत-प्रेत आदि से रक्षा के लिए काली मुर्गी की बलि दी गई.

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