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बाहर की दुनिया के लिए पेड़, पहाड़ और जमीन सिर्फ पैसा, आदिवासी समाज के लिए यह ईश्वरीय रूप : सरना आदिवासी धर्म कोड की मांग हुई तेज

by bnnbharat.com
February 21, 2021
in समाचार
बाहर की दुनिया के लिए पेड़, पहाड़ और जमीन सिर्फ पैसा, आदिवासी समाज के लिए यह ईश्वरीय रूप : सरना आदिवासी धर्म कोड की मांग हुई तेज
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रांची. पेड़-पौधे, पहाड़ और जमीन में बाहर के दुनिया के लोगों को पैसा नजर आता है, पर यह आदिवासी समाज के लिए ईश्वरीय रूप है, सदियों से आदिवासी समाज के लोग इसकी पूजा करते हैं और आज भी उनकी यह आस्था कम नहीं हुई है. आदिवासी समाज के लोग अब भी जंगलों में रहते है और प्रकृति की पूजा कर रहे है.

झारखंड में निवास करने वाले 32 तरह के आदिवासी समाज के लोग अलग-अलग नाम से जाने जाते है और उनका धर्म भी अलग है. अपने को प्रकृति पूजक बताने वाले आदिवासी समाज की रीति-रिवाज भी अन्य धर्मा से भिन्न है. सरना धर्म में पेड़, पौधे और पहाड़ समेत सभी प्राकृतिक संपदा की पूजा की जाती है. इस समाज की राज्य में एक बड़ी आबादी होने के कारण झारखंड की राजनीतिक, भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में आदिवासी समाज का प्रमुख स्थान है. वहीं हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड में गठबंधन की सरकार बनने के बाद अब जनगणना में आदिवासी समूह के लिए अलग से कॉलम की व्यवस्था की मांग जोर पकड़ने लगी है.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग की गवर्निंग कॉउन्सिल 2021 की वर्चुअल बैठक में जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग से कॉलम की मांग की, वहीं शनिवार देर रात हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस में भी इस बात को रखकर इस मुद्दे पर आदिवासी  बुद्धिजीवियों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की. हेमंत सोरेन का दावा है कि आदिवासी न कभी हिन्दू थे और न अभी हिन्दू है, इनका रीति-रिवाज अलग है और ये प्रकृति पूजक है.

हार्वर्ड इंडिया कांन्फ्रेस में हेमंत सोरेन ने कहा कि  आदिवासियों के लिए पॉलिसी में बात तो की जाती है. लेकिन कार्य इसके विपरीत है. देश में ट्राइबल कौंसिल, आदिवासी मंत्रालय है. संविधान के पांचवीं और छठी अनुसूचि में अधिकार प्राप्त है. लेकिन इसका लाभ आदिवासियों को नहीं मिल रहा है. यही वजह है कि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि आगामी जनगणना में आदिवासी समूह के लिए अलग कॉलम होना चाहिए. ताकि वे अपनी परंपरा और संस्कृति को संरक्षित कर आगे बढ़ सकें. मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखण्ड में कई तरह के आदिवासी हैं. झारखण्ड में उनकी अस्मिता की रक्षा के लिए कार्य किया जा रहा है. वर्तमान सरकार ने ट्राइबल यूनिवर्सिटी बनाने का निर्णय लिया है. जिससे शिक्षा के क्षेत्र में इनका सतत विकास हो सके. पूरे देश में आदिवासियों की पहचान कायम रहे. यह प्रयास सरकार का रहेगा. सरकार इन्हीं को केंद्र में रखकर कार्य कर रही है.  हेमंत ने कहा कि आदिवासियों की स्थिति क्या है. यह महत्वपूर्ण सवाल है. वे भी एक आदिवासी है और मुख्यमंत्री के पद पर पहुंचे है, लेकिन यह आसान नहीं था. संविधान में प्राप्त संरक्षण के बावजूद आदिवासियों को जगह नहीं दी गई. सदियों ने इन्हें दबाया गया. आज भी यही मानसिकता है. ऐसे समुदाय को बुरी नजरों से देखा जाता है. यह चिंता की बात है. यही वजह है कि सरकार आदिवासी बच्चों को विदेश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का अवसर प्रदान कर रही है. भारत सरकार भी इस तरह की योजना संचालित करती है. लेकिन आदिवासी बच्चों को योजना का लाभ नहीं मिल पाता है. 

प्रधानमंत्री के साथ वर्चुअल बैठक में मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से कहा कि आदिवासी समाज एक ऐसा समाज है, जिसकी सभ्यता, संस्कृति, व्यवस्था बिल्कुल अलग है. आदिवासियों को लेकर जनगणना में अपनी जगह स्थापित करने के लिए वर्षों से मांग रखी जा रही है. झारखंड विधानसभा से पारित कर राज्य सरना आदिवासी धर्म कोड की मांग से संबंधित प्रस्ताव भेजा है. उम्मीद करते हैं कि भारत सरकार इस पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेगी.

आदिवासियों के लिए अलग धर्म कॉलम था

सन 1871 से 1951 तक आदिवासियों के लिए अलग धर्म कॉलम था. परंतु संविधानसभा ने भारत के संविधान से आदिवासी शब्द ही हटा दिया. जब संविधानसभा में हुई बहस के दौरान तत्कालीन सांसद जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी शब्द की जगह अनुसूचित जनजाति शब्द लिखे जाने का जोरदार विरोध किया था. इस बार जनगणना में आदिवासियों के लिए अन्य का कॉलम भी हटा दिया गया है और उन्हें हिन्दू,ईसाई, मुस्लिम, सिख और जैन तथा पारसी में से किसी एक चुनना होगा. इसी कारण सरना धर्म कोड की मांग तेज हो गयी है.

सरना धर्म क्या है!

झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओड़िया और बिहार में आदिवासी समुदाय का बड़ा तबका अपने आपको सरना धर्म के अनुयायी के तौर पर मानता है. वो प्रकृति की प्रार्थना करते हैं और उनका विश्वास ‘जल, जंगल, जमीन’ है. ये वन क्षेत्रों की रक्षा करने में विश्वास करते हुए पेड़ों और पहाड़ियों की प्रार्थना करते हैं. झारखंड में 32 जनजातीय समूह है, जिसमें आठ विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में है. इनमें से कुछ हिन्दू धर्म का पालन का भी पालन करते, तो कुछ ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गये है. माना जाता है कि आदिवासी समुदाय के ईसाई समुदाय में परिवर्तित होने के बाद वे एसटी आरक्षण से वंचित हो जाते हैं, ऐसे में वे सरना धर्म की मांग करके अपने आपको आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं होना देना चाहते हैं.

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