अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिये जाने की मांग को लगा झटका
रांची: झारखंड में पक्ष-विपक्ष के कई सांसद-विधायक , राजनीतिक दल और सामाजिक संगठनों की ओर से कुरमी-कुड़मी जाति को लंबे समय से अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने की मांग की जा रही है. वहीं रांची स्थित डॉ0 रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य में निवासरत कुड़मी-कुरमी जाति में आदिम विशेषताओं का अभाव है.
डॉ0 रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान की ओर से इस संबंध में 23 नवंबर 2020 को सरकार को रिपोर्ट सौंपी गयी है. कार्मिक विभाग को शोध संस्थान की ओर से सौंपी गयी रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्तमान समय में कुरमी-कुड़मी जाति के लोग सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से अपेक्षाकृत मजबूत हैं. संस्थान की ओर से यह भी जानकारी दी गयी है कि अन्य समुदाय के लोगों के संपर्क करने में संकोचन बिल्कुल नहीं है और उनके बीच छुआछूत जैसी सामाजिक कलंक भी नहीं है. कार्मिक विभाग द्वारा यह जानकारी दी गयी है कि इसी तथ्यों के आलोक में तथा भारत सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के आधार पर वर्तमान परिवेश में झारखंड में निवासरस कुरमी-कुड़मी (महतो) जाति को यथास्थिति बनाये रखने की आवश्यकता है.
जनजातीय कल्याण शोध संस्थान से प्राप्त प्रतिवेदन के अनुसार भारत की जनगणना 1872 में ‘‘ जारी ट्राइब्स ऑर वुड ट्राइब्स के रूप में कुरमी-कुड़मी को चिह्नित नहीं किया गया है, बल्कि जारी कुरमी ऑर कुरमी ऑफ द वुड्स के रूप में उल्लेखित किया गया है. राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की ओर से भी यह स्पष्ट किया गया है कि कुरमी (महतो) छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (सीएनटी) 1908 के अंतर्गत पिछड़े वर्ग की सूची में सूचीबद्ध है. इस सूची में आदिम जाति कुड़मी-कुरमी सूचीबद्ध नहीं है. दूसरी तरफ कुरमी-कुड़मी जाति को आदिम जनजाति का दर्जा करने वाले संगठनों की ओर से कहा जाता है कि आजादी के बाद 1951 ममें हुई पहली जनगणना में कुरमी-कुड़मी को अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं किया गया, जबकि इससे पहले कुरमी-कुड़मी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त था. वहीं सरकार का कहना है कि 1951 की जनगणना से संबंधित अभिलेख या आंकड़े कार्मिक विभाग में उपलब्ध ही नहीं हैं.

